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यूपी का राजदरबार : साहब की परीक्षा …

लखनऊ : शहरों का सुनियोजित विकास हो, सूबे के हर शहर में सभी मोहल्ले और गली साफ सुथरी हो, जनता को साफ और शुद्ध पेयजल मिले। ऐसे ही तमाम दायित्वों को निभाने वाले महकमें के वह मुखिया हैं। आईएएस संवर्ग में वह जुगाडू अफसर माने जाते हैं। योगी सरकार के बनने के बाद वह इस महकमें के मुखिया बनाये गए थे। तब कहा गया था कि पड़ोसी जिले में जन्मे ये नौकरशाह बहुत काबिल हैं और गुजरात की तर्ज पर वह यूपी के कई शहरों को स्मार्ट सिटी में तब्दील कर देंगे। इसके लिए वह जो भी मदद चाहेंगे वह राज्य सरकार और केंद्र सरकार के स्तर से उपलब्ध करा दी जायेगी।

काम करने की मिली ऐसी ही आजादी के बीच साहब की अपने विभाग के दायित्वों को निभाने के दरमियान ही अपने कैबिनेट मंत्री से ठन गई। दोनों एक दूसरे के फैसलों की अनदेखी करने लगे। जिसकी भनक केंद्र को लगी तो कैबिनेट मंत्री से उक्त महकमें का दायित्व ले लिया गया, ताकि नए मंत्री के साथ मिल कर साहब यूपी का स्मार्ट राज्य में तब्दील करने के सपने को साकार कर सकें।

कहते हैं जो सोचा जाता हैं, वह आसानी से पूरा नहीं होता। इस मामले भी ऐसा हो रहा है। अब विभागीय मंत्री के साथ तो साहब का तालमेल तो बन गया है, पर सूबे के सुनियोजित विकास के लिए अन्य विभागों और जिलों में तैनात अफसरों के साथ उनकी टयूनिंग गड़बड़ा गई है। कहा जा रहा है कि ये साहब विभाग और जिलों के अफसरों के हडकाते हुए तय समय में कार्य पूरा करने का आदेश देते हैं।

उनका यह व्यवहार अफसरों को भा नहीं रहा है और वो उनके खिलाफ बोलने लगे। ऐसे संकट के समय आश्वासन समिति की कई बैठकों में साहब नहीं गए। उनकी गैर मौजूदगी को लेकर विधायको ने आपत्ति की तो विधानसभा अध्यक्ष ने साहब की क्लास ली। मुख्यमंत्री से लेकर सरकार के तमाम मंत्रियों को भी इसकी जानकारी हुई। जिसके बाद से साहब अपने आकाओं को सफाई दे रहें हैं कि बजट की कमी के चलते वह शहरों के सुनियोजित विकास की योजनाओं की गति तेज नहीं करा पा रहे हैं। लेकिन साहब की ऐसी सफाई के बीच ही अब वो नेता भी उन्हें नाकाराधिकारी कहने लगे है, जो उन्हें काबिल बताते थे। अब देखना यह है कि अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को कैसे खामोश करते हैं? यही साहब की परीक्षा है। — साभार वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार जी की फेसबुक वाल से.

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