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सरकारी उपेक्षा का शिकार बन रहा, अंतिम पायदान पर बैठा असंगठित क्षेत्र का मजदूर

#इस क्षेत्र के मजदूरों के कल्याण के लिए गठित BOCW कल्याण बोर्ड अब तक रहा है निष्प्रभावी.

#अधिष्ठानों और ठेकेदारो सहित मजदूरों के रजिस्ट्रेशन की धीमी गति पर उठ रहे सवाल.

#सुविधा को तरसते मजदूर, सेस व पंजीकरण शुल्क के करीब 4000 करोड़ की रकम सरकारी खजाने में पड़ी अप्रयुक्त.

#अफसरों के पास खर्च का कारगर रोडमैप नहीं , पीएम की समाज के अंतिम पायदान तक लाभ पहुंचाने की मंशा पर ग्रहण.

#उपकर वसूली की रकम कभी कोषागार तो कहीं बैंक में होती रही जमा, आज तक नहीं बन पाया बोर्ड का फाइनल एकाउण्ट.

#श्रम और वित्त विभाग नहीं तलाश पा रहे CAG की ऑडिट आपत्ति का समाधान.

#CAG के अनुसार अफसरों द्वारा उपकर व पंजीकरण शुल्क से आये धन को सीधे कोषागार से बैंक में ट्रांसफर किया जाना आपत्तिजनक.

राजेश तिवारी

लखनऊ : एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के कल्याण के लिए प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन पेंशन योजना का ऐलान करते हैं और सूबे के मुख्य सचिव के स्तर से अधिक से अधिक पात्र श्रमिकों के पंजीकरण के लिए शासनादेश जारी करते हैं तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश सरकार की अफसरशाही श्रमिक कल्याण के घोषित लक्ष्य को पूरा करने में उदासीन बनी हुई है. यदि उत्तर प्रदेश के श्रम विभाग के जिम्मेदार इसको लेकर गम्भीर होते तो प्रदेश में निर्माण कार्यों पर पिछले 10 वर्षों में खर्च की गयी रकम पर 1% लेबर सेस की वसूली का आंकलन भी गम्भीरता से किया जाता तो यह धनराशि वर्तमान उपलब्ध 4 हजार करोड़ से कई गुना अधिक होती. और यदि इस उपलब्ध धनराशि के श्रमिक कल्याण पर खर्च लिए ठोस उपायों पर गम्भीरता दिखाई गयी होती तो आज प्रधानमन्त्री मोदी के प्रयासों को जहां गति मिलती वहीँ भाजपा के पंडित दीनदयाल उपाध्याय का सपना भी साकार होता.

जानकारों के अनुसार पीडब्ल्यूडी, ग्राम्य विकास (मनरेगा), पंचायती राज, समाज कल्याण, जलनिगम, सीएंडडीएस और आरईएस जैसे विभागों और कार्यदायी संस्थाओं ने ठेकेदारों को भुगतान किए जाने वाले बिलों से 1% उपकर (लेबरसेस) की कटौती की जाती है. लेकिन अगर इन विभागों की योजनाओं में निर्माण कार्य का पिछले 10 वर्षों का बजट और ठेकेदारों को भुगतना की गई धनराशि के आंकड़ों को जोड़ दिया जाय तो उपकर के रूप में वसूल होने वाली धनराशि का आंकड़ा काफी अधिक होगा. परन्तु जिस तरह मजदूरों के पंजीकरण के बगैर ही निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं उसी तरह उपकर की वसूली और वसूल की गई धनराशि का वित्तीय प्रबंध और मजदूरों को लाभ देने में खर्च की गई रकम की मात्रा यह बताने के लिए काफी है कि सूबे का श्रम विभाग इस मुद्दे पर अभी तक नाकाम साबित हुआ है.

आखिर कैसे होगा पंडित दीनदयाल का सपना साकार, कब अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति को मिलेगा पूरा लाभ

समाज के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने का सरकारी ऐलान और श्रमिक कल्याण का दावा करने वाली योगी सरकार इस मुद्दे पर हरकत में दिखाई तो दे रही है. श्रम एवं सेवायोजन मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या ने अपने विभाग की समीक्षा के दौरान  कल्याणकारी योजनाओं में श्रमिकों के लक्ष्य से कम पंजीकरण होने पर नाराजगी जताते हुए मनरेगा, ईट- भट्ठों और गौशाला में काम करने वाले मजदूरों के रजिस्ट्रेशन और रिन्यूअल करने के कार्य में तेजी लाने के आदेश भी दिए हैं. लेकिन जानकारों की मानें तो सरकार की यह हड़बड़ी CAG की हालिया प्रकाशित रिपोर्ट में कलई खुलने के बाद शुरू हुई है जिसमें भवन एवं अन्य निर्माण कार्यों लगे असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के कल्याण के लिए बनायी गयी उत्तर प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार (नियोजन एवं सेवाशर्त विनियमन) 1999 और इसे लागू करने के लिए वर्ष 2009 में बनायी गयी नियमावली के प्रावधानों को लागू कर पाने में नाकामी को उजागर करते हुए कड़ी आपत्ति उठायी गयी है.

बात निकली है  तो दूर तलक जाएगी……….

सरकारी विभागों और विकास  प्राधिकरणों में BOCW कल्याण बोर्ड के गठन के बाद से लाखों करोड़ का बजट निर्माण कार्यों के लिये रिलीज किया गया है वहीं प्राईवेट बिल्डरों की गतिविधियाँ भी गौर करने लायक रही हैं. इस तरह खर्च की गयी धनराशि का 1% लेबरसेस के रूप में कितनी बड़ी धनराशि हो सकती है इसके बारे में बस कयास ही लगाया जा सकता है. क्योंकि जिस बोर्ड में “न खाता न बही, साहब जो बतायें वही सही” की थीम चल रही हो जिसके CAG ऑडिट को भी Provisional data के आधार पर कराया जाये उसकी वास्तविक स्थिती का आकलन किस तरह किया जायेगा, यह बड़ा सवाल है.

उपकर और पंजीयन शुल्क के रूप में वसूली गयी रकम को सीधे बैंक खातों में जमा कराने का आदेश हालाँकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए किया गया है लेकिन यह रकम राज्य के “कंसोलिडेटेड फण्ड” में कैसे पहुंचेगी इस बारे में व्यवस्था बनाने में अफसरशाही चूक गयी. जबकि CAG के अनुसार संवैधानिक व्यवस्था के पालन के लिये ऐसा किया जाना जरूरी है.

जानिये क्या है CAG रिपोर्ट में….

भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार (बीओसीडब्ल्यू) कल्याण बोर्ड का गठन उत्तर प्रदेश सरकार ने नवम्बर 2009 में किया जिसका उद्देश्य बीओसीडब्ल्यू कल्याण उपकर अधिनियम 1996 की व्यवस्था के अनुसार श्रमिकों के कार्य की दशा में सुधार करना तथा विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के अंतर्गत इन्हें वित्तीय सहायता प्रदान किया जाना था. इसके लिए बोर्ड के संसाधन में निर्माण कार्यों की लागत पर उपकर की वसूली के माध्यम से जुटाए जाने थे इसलिए सरकार ने उपकर अधिनियम के अनुसार निर्माण कार्यों पर 1% की दर से उपकर लिए जाने का प्रावधान किया और बीओसीडब्ल्यू नियमावली 2009 बनाई गई.

जिसके तहत असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का रजिस्ट्रेशन कर उनसे पंजीकरण शुल्क के रूप में 50 रुपये और वार्षिक सदस्यता के रूप में 50 रुपये लिए जाने थे. लेकिन CAG जैसी संस्था भी उस समय अपने आपको विवश महसूस करने लगी जब यह पाया गया कि बीओसीडब्ल्यू बोर्ड के गठन के समय से ही उसका फाइनल एकाउंट नहीं बनाया गया है. जिससे यह पता नहीं चल सकता कि उपकर तथा शुल्क के रूप में कितनी धनराशि जमा की गई और कितनी धनराशि बोर्ड को स्थानांतरित की गई. आडिट के दौरान बोर्ड द्वारा उपलब्ध कराए गए प्रोविजनल डाटा के अनुसार बोर्ड द्वारा मजदूरों के कल्याण के लिए उपलब्ध धनराशि के सापेक्ष 5 से 7 प्रतिशत ही व्यय किया गया. और कुल पंजीकृत श्रमिकों के 8 से 15 प्रतिशत श्रमिकों को ही लाभ दिया गया.

देखिये CAG टेबल 3.6 और 3.7…….

इस सम्बंध में सरकार द्वारा अगस्त 2013 एवं सितम्बर 2016 में शासनादेश जारी कर वसूल किये गए उपकर को राज्य की समेकित निधि में लाये बिना सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर किये जानें को संविधान के अनुच्छेद 266 (1) का उल्लंघन माना गया है.

इस सम्बन्ध में प्रमुख सचिव शैलेश कृष्ण द्वारा 2013 में दिया गया आदेश 

इसके बाद वर्ष  2016 में तत्कालीन प्रमुख सचिव व वर्तमान  में कार्यवाहक मुख्य सचिव का आदेश 

 

 

 

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