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हर जांच में दोषी, आरोपपत्र पा चुका संजय तिवारी बाज नही आ रहा, चेयरमैन को गुमराह करने में जुटा ओबरा अग्निकांड का गुनाहगार

#खजाने को चोट पहुंचाया, मनमानी पर उतर आया, बिजलीघर फुंकवाया, पर अब तक सजा न पाया, अब उसकी सेवा का 10 महीने ही  बाकी.

#क्या माला पहन सम्मान ले रिटायर हो जाएगा वित्तिय अनियमितता करने वाला दागी निदेशक.

राजेश तिवारी

लखनऊ : हर जांच में गुनाहगार निकला बिजली उत्पादन निगम का निदेशक कार्मिक संजय तिवारी, अब आरोप पत्र पा चुकने के बाद अपने चेयरमैन को गुमराह करने में जुटा है. ओबरा बिजलीघर फुंकवाने का दोषी तिवारी सरकारी खजाने को करोड़ों की चोट पहुंचाने के बाद अब खुद को आरोपपत्र देने वाली समिति पर ही सवाल खड़े कर एक बार फिर बच निकलना चाहता है. तब जबकि इस कथित निदेशक की कारस्तानियों से आज भी हर रोज उत्पादन निगम को करोड़ों की चपत लग रही है, और ओबरा बिजलीघर का उत्पादन पटरी पर नही आ पाया है. ओबरा आग्निकांड में आरोपपत्र को कोर्ट वगैरा के झमेले में लटकाने के बाद जब आखिरकार तिवारी को इसे सौंपा गया तो इसने एकबार फिर से गुमराह करने का खेल शुरु कर दिया.

इससे पहले इस निदेशक नें लगातार तीन दिन तक आरोपपत्र लेने तक से मना किया और समूचे उत्पादन निगम में कार्मिक के साथ अनुशासन के अनुपालन का जिम्मा निभाने वाले इस बेअंदाज को डाक के जरिए आरोपपत्र सौंपना पड़ा. अब आरोपपत्र पाने के बाद यह दागी निदेशक अपने चेयरमैन अरविंद कुमार को पत्र भेज कर जांच समिति को दोषपूर्ण बताते हुए गुमराह करने में जुट गया है ताकि अपने बचे 10 महीने के कार्यकाल को बिना सजा के पूरा कर सके. जबकि आरोपपत्र पर सूबे की सबसे बड़ी अदालत, उच्च न्यायालय तक पहुंचे तिवारी ने तब कभी समिति के गठन पर उंगली नही उठायी थी. अधीनस्थों के साथ गाली गलौज, तबादला-तैनाती में खेल के चलते वीआरएस लेने वालों की संख्या भी करीब आधा दर्जन पहुंची लेकिन प्रबंधन संजय तिवारी के सामने मजबूर है.

वाह रे ऊर्जा विभाग, निदेशक अंशुल को 6 महीने में जांच और सजा, तो उत्पादन निगम के निदेशक संजय तिवारी को 3 साल में भी नहीं

ऊर्जा विभाग के निगम ट्रांसमिशन और उत्पादन निगम के प्रबंधन की कार्यशैली पर नजर डालें तो मामला कुछ और ही दिखता है. मिली जानकारी के अनुसार ट्रांसमिशन में निदेशक तकनीकी रहे अंशुल अग्रवाल को चार्जशीट मिलने के बाद तत्कालीन प्रबंध निदेशक अपर्णा यू ने शासन स्तर तक पहल कर लापरवाह व दोषी को पद से रिमूव कराने के लिए पहल कर अंजाम तक पहंचाया. लेकिन उत्पादन निगम में वित्तीय अनियमितता का दोषी और ओबरा अग्निकांड में करोड़ों के सरकारी धन को स्वाहा करने वाले चार्जशीटेड आरोपी निदेशक कार्मिक संजय तिवारी को वक्त पर वक्त दिया जा रहा है. संजय तिवारी को पहले दी गयी चार्जशीट के जवाब के लिए 3 बार समय दिया गया ताकि वह कोर्ट जा सके. अब दुबारा चार्जशीट लेने में टालमटोल करने वाले संजय तिवारी को स्पीड पोस्ट के माध्यम से चार्जशीट दिए 1 महीने से उपर हो गया लेकिन उसको पद से रिमूव कराने के बजाय प्रबंधन अभी तक उससे जवाब नहीं ले सका और इसके लिए उसको एक बार फिर से जवाब का समय देकर बचाने का काम किया जा रहा है.

इतनी ढिलाई प्रबंधन यह जानते हुये कर रहा है कि उसकी नियुक्ति ही गलत हुई है. बताते चलें कि जब संजय तिवारी की नियुक्ति निदेशक पद पर हुई थी तो उस समय वह एक वित्तीय मामले की थर्ड पार्टी आडिट में आरोपी साबित हो चुका था. अब इसके लिए जिम्मेदार कौन शासन या फिर प्रबंधन यह पता लगाना सरकार का काम है लेकिन इससे एक बात जरूर साबित होती है कि अफसरशाही का यह दांवपेच मुख्यमंत्री योगी के मंसूबों को ठेंगा दिखाने वाला है.                    

योगी का  CAA के विरोध में हुए सरकारी संपत्ति के नुकसान की वसूली का कार्य सराहनीय, करोड़ों के वित्तीय नुकसान के दोषसिद्ध आरोपी संजय तिवारी से भी वसूली जरूरी

ओबरा अग्निकाण्ड के बाद संजय तिवारी को पद से हटा जांच कराने और दोष सिद्ध होने पर निदेशक पद से रिमूव करने के बजाय प्रबंधन उसकी खिदमत में लगा है. एक तरफ सरकारी सम्पत्ति का नुकसान करने वालों से सख्ती से निपट रही है तो दूसरी तरफ उत्पादन निगम वसूली करने के बजाय उसको बचाने का काम कर रहा है. उत्पादन निगम के प्रबंधन ने ओबरा अग्निकांड में दोषी इंजीनियर को तो सस्पेंड कर दिया था लेकिन दोषी निदेशक पर 15 महीने के बाद भी कार्यवाही सम्भव नहीं करा सका. कारण साफ़ है कि अब संजय तिवारी के निदेशक पद का कार्यकाल करीब 10 माह बचा है और उसको रिटायर करने का मौका दिया जा रहा है जबकि उसको अबतक पद से रिमूव कर दिया जाना चाहिए था. अब इसका जिम्मेदार कौन शासन या प्रबंधन? यह तय करना शासन और सरकार का काम है. क्या कर्मचारियों का पैसा जीपीएफ घोटाले में गंवाने वाला ऊर्जा विभाग और उत्पादन निगम संजय तिवारी से हुए राजस्व के नुकसान की वसूली कर पायेंगे जिसके खुद ही जांच कर दोषी ठहराया है.

खुद को बचाने के लिए कोर्ट जाने वाला संजय तिवारी का खेल अब भी जारी, जांच कमेटी पर उठा रहा सवाल लिखा पत्र 

ओबरा अग्निकांड में चार्जशीटेड संजय तिवारी पहले तो चार्जशीट मिलने पर कोर्ट गया वहां से राहत न मिलने पर अब जांच कमेटी पर सवाल उठा कर मामले को उलझा रहा है और उत्पादन निगम उसको मौका दे रहा है. बताते चलें कि कोर्ट द्वारा चार्जशीट देने की प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बाद जब पुनः दिनांक 17 दिसम्बर 2019 को चार्जशीट देने की प्रक्रिया कमेटी द्वारा की गयी तो पहले वह तीन दिन आनाकानी किया जिसके बाद उसको स्पीड पोस्ट के माध्यम से चार्जशीट भेजी गयी. संजय तिवारी के पत्र से साफ़ है कि उसको यह स्पीड पोस्ट 23 दिसम्बर 2019 को मिल गयी लेकिन 1 माह बीत जाने के बाद भी अभी तक उसका जवाब नहीं आ सका है. अब संजय तिवारी के जवाब न देने की स्थिति में उसपर कार्यवाही करने के बजाय उसको एकबार फिर से पहले की ही तरह मौका पर मौका दिया जा रहा है. इस तरह तिवारी के बचे कार्यकाल को प्रक्रियाओं में उलझा कर पास करने की एक सोची समझी रणनीति के तहत काम किया जा रहा है जिसमें प्रबंधन से लेकर शासन जिम्मेदार है.

पत्र से हुआ खुलासा, जांच सम्बन्धी अग्रेतर कार्यवाही हेतु बनाई गयी समिति के संयोजक अनिल तिवारी पर भी किया अपशब्दों का प्रयोग, पत्र की कापी प्रबंध निदेशक को भी लेकिन चुप 

जांच सम्बन्धी अग्रेतर कार्यवाही हेतु बनाई गयी समिति में संयोजक की भूमिका निभा रहे अनिल तिवारी निदेशक कार्मिक की कुर्सी पर बैठे संजय तिवारी को जब चार्जशीट देने के लिए गये तो बेअंदाज संजय तिवारी ने उनको भी खरी खोटी सुनाई और अपशब्दों का प्रयोग किया जिसका जिक्र जांच कमेटी के उस पत्र में है जोकि कमेटी द्वारा अनिल तिवारी को दिया गया है और कापी प्रबंध निदेशक को मार्क की गयी है. बताते हैं कि संजय तिवारी प्रबंध निदेशक संथिल पांडियन को भी ठेंगे पर रखता है और उनके बुलाने पर खुद न जाकर किसी एनी को भेज देता है. उत्पादन निगम में कार्मिक के मुखिया के तौर पर बैठे एक लोकसेवक का यह कृत्य मुख्यमंत्री योगी और उनके नेत्रित्व वाली सरकार की मंशा को चेलेंज करना है. सीएम योगी अपनी हर बैठक में अधिकारियों को अनुशासन का पाठ पढाते हैं उसके बाद यह हाल है. संजय तिवारी के इन हरकतों पर प्रबंधन मौन है.

 कौन देगा सवालों का जवाब और कब होगी कार्यवाही ? आखिर कौन बचा रहा संजय तिवारी को शासन या फिर प्रबंधन ?  

इस तरह एक ईमानदार मुख्यमंत्री और उसकी जीरो टोलरेंस की नीति को ठेंगा दिखाया जा रहा है. उत्पादन निगम का कार्मिक विभाग का निदेशक और प्रबंधन व शासन न जाने किस मजबूरी के तहत चुप्पी साधे हुए है. निगम में HR की नीतिओं और पक्षपात के चलते लोग वीआरएस लेने को मजबूर हो रहे हैं तो किसी के स्ट्रेचर पर जाकर ज्वाईन करने की तो किसी के तबादले से जान जाने का भी आरोप भी लग रहा है. योगी के जीरो टोलरेंस की नीति को पलीता लगाते हुए वित्तीय अनियमितता के थर्ड पार्टी आडिट रिपोर्ट के ऊपर विभागीय जांच कमेटी बना कर निदेशक कार्मिक संजय तिवारी को उसका कार्यकाल पूरा कराया जा रहा है. जबकि ओबरा अग्निकांड में भी वह दोष सिद्ध आरोपी है लेकिन प्रबंधन जांच आदि के नाम पर उस पर मेहरबान है और उसके बचे करीब 10 माह के कार्यकाल को पूरा कराने में लगा है.

आलम यह है कि ऊर्जा विभाग के उत्पादन निगम के कुल 4 निदेशकों में अलग-अलग मामलों में 3 दागी साबित हुए लेकिन सजा केवल एक निदेशक वित्त सुधांशु द्विवेदी को ही मिला क्योंकि इसके लिए खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मोर्चा सम्भालना पड़ा था. विपक्ष आक्रामक न होता और सीएम योगी ने कमान नहीं संभाली होती तो निदेशक तकनीकी रहे बीएस तिवारी और वर्तमान निदेशक कार्मिक संजय तिवारी की तरह सुधांशु द्विवेदी भी जांच की आड़ में प्रबंधन की कृपा से आज मजे काट रहा होता. जैसे दागी निदेशक तकनीकी रहे बीएस तिवारी को प्रबंधन ने माला पहनाकर रिटायर किया जबकि वित्तीय अनियमितता सहित उसके गुनाहों के तमाम दस्तावेदी सबूत प्रबंधन के पास आज भी मौजूद हैं.

सरकार कायदे क़ानून से चलती है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समय- समय पर इसके अनुपालन के लिए कड़े कदम भी उठाते रहे हैं, तो उत्कृष्ट कार्य के लिए अधिकारियों व कर्मचारियों को प्रोत्साहित भी करते रहे हैं. लेकिन ऊर्जा विभाग के उत्पादन निगम में चल रही अनियमितता और पक्षपात का जिम्मेदार कौन है? ओबरा अग्निकांड में जब इंजीनियर सुरेश कुमार, डी.के. मिश्र आदि को सस्पेंड किया जा चुका है तो निदेशक कार्मिक संजय तिवारी पर कार्यवाही करने में 15 महीने से ज्यादा क्यों लगे? लापरवाही शासन की है या फिर प्रबंधन की इसको भी साफ़ करना जरूरी होगा नहीं तो निचले स्तर पर कार्यवाही की खानापूर्ति कर मामला रफा दफा कर दिया जाएगा. नागरिकता क़ानून का विरोध कर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से वसूली जैसा सराहनीय कार्य करने वाली योगी सरकार को वित्तीय अनियमितता के जिम्मेदार बड़े ओहदेदारों से भी वसूली जैसे कड़े कदम उठाने होंगे.

और बहुत से सवाल अभी बाकी हैं, अगले अंक में ………………….

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