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“अफसरनामा” की खबर से दबाव में आये उत्पादन निगम के निदेशक मंडल ने जारी किया नया आदेश

#निदेशक मंडल की स्वीकृति और जारी आदेश के बीच 1 महीने का अंतर.

#जारी आदेश में कुछ चीजों को किया गया नजरअंदाज तो भ्रष्टाचार को लेकर उठाये गए बिंदु पर चुप.

अफसरनामा ब्यूरो

लखनऊ : पिछले दिनों “अफसरनामा” द्वारा “उत्पादन निगम में शीर्ष पदों पर अफसरों का टोटा”  24 जनवरी 2019 नामक शीर्षक से एक खबर प्रकाशित किया था, जिसमें निगम में चल रहे भ्रष्टाचार व प्रबंधन की कार्यशैली पर सवाल उठाये गए थे. इस खबर का असर यह रहा कि उत्पादन निगम ने एक बोर्ड बैठक तक कर डाली और आनन-फानन में 07 फरवरी को एक आदेश जारी कर उस आर्गेनाईजेशन स्ट्रक्चर के तहत जारी समस्त आदेश को ही निष्प्रभावी करार कर दिया जिसको आधार बनाकर सवाल उठाये गए थे. लेकिन आदेश के नीचे लिखे नोट में उस बिंदु को निष्प्रभावी नहीं किया जोकि निगम में भ्रष्टाचार की जड़ साबित है. करीब 2 साल पहले निगम द्वारा पदों की स्वीकृति हेतु एक पत्र शासन को भेजा गया था जोकि अभी वित्त विभाग में लंबित है. इस पूरे प्रकरण में शासन को गुमराह करते हुए एक बड़े खेल को जगह दी गयी है. “अफसरनामा” इस बड़े खेल का खुलासा भी जल्द ही करेगा.

दिनांक 07 फरवरी 19 को जारी नया आदेश संख्या “31” उत्पादन निगम मे पदों के लिए किया गया है, वह उत्पादन निगम के मानव संसाधन निदेशालय की असंवेदनशीलता और निगम मे सुनियोजित भ्रष्टाचार की प्लानिंग का एक बड़ा जीता जागता दस्तावेज है. सबसे बड़ी विडम्बना जवाहरपुर परियोजना के निर्माण में पदों को लेकर है. पूर्व में निगम ऑर्गनाइजेशन स्ट्रक्चर 2016 में जवाहरपुर में 3 चीफ़ इंजीनियर सहित एक बड़ी मानव शक्ति स्वीकृत की गई थी. अब दिनांक 07 फरवरी के आदेश मे सभी पदों को खत्म करके शून्य Cheif Engineer, शून्य DGM कर दिए गए हैं, जबकि कुछ XEN के पद स्वीकृत किए गए हैं. अब कोई भी यह अनुमान लगा सकता है 10000 करोड़ रुपए की लागत से निर्मित होने वाली परियोजना क्या बिना चीफ़ इंजीनियर के बन पाएगी?

 

निदेशक मंडल की बैठक के बाद जारी आदेश…..

 

देखें ….जारी आदेश का अंतिम पेज जिसपर नोट लिखा गया है…

इसके अलावा बड़ा सवाल यह भी है कि जब जवाहरपुर परियोजना का नियोजन निविदा आदि के कार्य उत्पादन निगम मे वर्ष 2014 से ही चल रहे हैं तो 5 साल व्यतीत हो जाने के बाद भी परियोजना के नाम पर कोई पद ना स्वीकृत करा पाने का दोषी कौन है? विशेषकर पिछले दो सालों में जबकि निर्माण का कार्य चल रहा है. बताते चलें कि जवाहरपुर विद्युत निगम एक अलग कंपनी है जिसका स्वामित्व उत्पादन निगम के पास है तथा निदेशक कार्मिक संजय तिवारी ही इसके निदेशक हैं और यदि निर्माण मे देरी मानव संसाधन की खराब प्लानिंग के कारण होता है तो जवाबदेह भी निदेशक कार्मिक संजय तिवारी ही माने जाएंगे.

बताते चलें कि जवाहरपुर विद्युत निगम पहले पावर कार्पोरेशन के अधीन था. सन 2015 में राज्य सरकार द्वारा यह उत्पादन निगम के अंतर्गत कर दिया गया क्योंकि उत्पादन निगम मे बिजली घर बनाने के अनुभव रखने वाले कार्मिक थे और यह निगम का मूल कार्य था. परंतु देखा जाय तो  यदि यह परियोजना PCL मे ही रही होती तो इसके लिए ऐसी हास्यास्पद स्थिति तो ना आती जहां 5 साल  बाद शून्य इंजीनियर की व्यवस्था की गई है. PCL ने अब तक समुचित मात्रा मे निर्माण के इंजीनियर ही नहीं स्वीकृत करा लेते बल्कि प्लांट चलाने वाले कार्मिको की व्यवस्था भी कर ली होती जो कि उत्पादन निगम के एजेंडा मे ही नहीं है. यह कार्मिक निदेशालय विशेषकर निदेशक कार्मिक संजय तिवारी के अक्षमता का जीता जागता उदाहरण है. 

उत्पादन निगम के कर्मीयों की हकीकत यह है कि दुरूह स्थानों में रहते अपने कामों को अंजाम देते हैं और जब कभी अपनी निजी जरूरत से निदेशालय कोसों  दूर से चल कर आते हैं तो निदेशक कार्मिक द्वारा संवेदनहीनता के स्तर तक ब्यवहार किया जाता है जिसका जीता जागता उदाहरण है DGM DS Rai का इस्तीफा. निदेशक कार्मिक द्वारा दूर दराज से आये कर्मचारियों से उनकी समस्या सुनने के बजाय उनपर व्यंग्य करके उन्हें अपमानित जैसा व्यवहार किये जाने की खबरें भी चर्चा में हैं. निदेशक कार्मिक उनकी  समस्या सुलझाने पर विचार करने के बजाय उसे काटने के उपाय ढूंढने लगते हैं, जिससे यहाँ आकर केवल वे वितृष्णा को प्राप्त होते हैं और VRS की स्थिति को पहुंच जाते हैं. ऐसे में सरकार की हर नागरिक के प्रति संवेदनशील होने की नीति और नीयत को ये निदेशक कार्मिक धता बता देते हैं और अपने हित साधन, और बचाव कार्य में लगे रहते हैं.

जब कुछ दिन पहले इन्हें अपने जैसे असंवेदनशील MD अमित गुप्ता का सहारा मिल गया था तब इन्होने एक ऐसे कर्मचारी को Panki से ट्रान्सफर पर दूसरी जगह जॉइन करने को मजबूर कर दिया था जो कि  नौकरी बचाने के लिए स्ट्रेचर पर जा कर अपनी जॉइनिंग दिया था. अब जब महकमे में एक कड़क मिजाज का ईमानदार प्रबंध निदेशक आया है तो अब कर्मचारियों/अधिकारियों को मौखिक रूप से तमाम नियमों का हवाला देते हुए यह आदेश देते हैं कि एमडी महोदय से अपनी समस्याओं के लिए नहीं मिलना है यह नियमविरुद्ध है.

इसके अलावा एटा के जवाहरपुर में निर्माणाधीन बिजली परियोजना में लगातार हो रही सरिया चोरी का खुलासा स्थानीय प्रशासन ने किया था और उसमें एक अंतर्राज्यीय गिरोह “दुजाना गैंग” का नाम सामने आया था. जिला प्रशासन की जांच रिपोर्ट में प्रथमदृष्टया 4 विभागीय अधिकारियों की संलिप्तता भी पाई गयी थी, जिसमें तत्कालीन परियोजना प्रबंधक यूएस गुप्ता का नाम भी था. तब इन्हीं संजय तिवारी ने यूएस गुप्ता को एटा से हटाकर मुख्यालय में उससे बड़ी इकाई का मुखिया बना दिया था जिसको बाद में एमडी पांडियन ने पारीछा अटैच किया. इसी बीच प्रमुख सचिव ऊर्जा आलोक कुमार ने प्रमुख सचिव गृह अरविन्द कुमार को इसकी जांच कराने के लिए एक SIT गठित करने को लेकर सितम्बर 2018 में एक पत्र लिखा जोकि अभी शासन में लंबित है. अब इस घटना के करीब 5 महीने बीत जाने के बाद एक बार फिर से परदे के पीछे से निदेशक कार्मिक संजय तिवारी यूएस गुप्ता को पुनः वापसी हेतु सक्रिय हो चुके हैं जोकि दोनों के संबंधों को समझने के लिए काफी है. अब देखना यह होगा कि क्या बिना SIT जांच के ही US Gupta को वापस कराने में निदेशक कार्मिक संजय तिवारी सफल होंगे.   

SIT जांच और निदेशक कार्मिक की भूमिका सहित अन्य चीजों का खुलासा जल्द ही…….

यूपी विद्युत् उत्पादन निगम में शीर्ष स्तर पर इंजीनियरों का टोटा

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सरिया चोरी के पूरे खेल की जानकारी के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें ……

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