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हाल अफसरों का “जो मर्जी चाहे करिए, सरकार के चहेते आईएएस हैं बनिए”   

अफसरनामा ब्यूरो  

लखनऊ : संजीव मित्तल आईएएस 1987 बैच, आलोक कुमार आईएएस 1988 और शशि प्रकाश गोयल आईएएस 1989 बैच, उत्तर प्रदेश की अफसरशाही के शीर्ष स्तर पर तैनात ये वह प्रमुख अफसर हैं जोकि अपनी कार्यशैली को लेकर किसी न किसी रूप में चर्चा में रहे हैं. शासन में अति महत्वूवर्ण ओहदों पर तैनात वैश्य बिरादरी के इन तीनों अफसरों के ठाट भी निराले हैं. इनके बारे में आम शोहरत है कि मुख्यमंत्री के अलावा ये किसी दूसरे मंत्री या सत्तारूढ़ दल के किसी भी बड़े नेता की बात भी नहीं मानते हैं. यही नहीं कहा तो यहां तक जाता है कि अव्वल तो ये  अफसर सूबे की ब्यूरोक्रेसी के मुखिया यानी मुख्य सचिव अनूप पांडेय की बात नहीं सुनते और यदि सुनते हैं तो  करते वहीं हैं जो ये चाहते हैं.

संजीव मित्तल आईएएस 1986 बैच, वित्त आयुक्त एवं अपरमुख्य सचिव वित्त

संजीव मित्तल राज्य के वित्त आयुक्त एवं अपरमुख्य सचिव वित्त के पड़ पर तैनात हैं. इनके विभागीय कबीना मंत्री राजेश अग्रवाल हैं. मजे की बात यह है कि पद संभालने के साथ ही मंत्री के साथ इनका शीतयुद्ध जारी है. पिछले साल अनूप चंद्र पांडेय को राजीव कुमार के स्थान पर राज्य का मुख्य सचिव बनाये जाने के बाद संजीव मित्तल को वित्त विभाग में ब्यूरोक्रेसी की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठाया गया था. वैसे तो वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल और उनके साथ रहे वित्त आयुक्त अनूप पांडेय के बीच भी लगातार लड़ाई चलती रही और कई मौकों पर इसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हस्तक्षेप करना पड़ा. अनूप पांडेय मुख्य सचिव बने और उनके स्थान पर संजीव मित्तल आये और तबादलों का सीजन आया तो दोनों के बीच मतभेद बढ़ने लगे.

फिलहाल ताजा प्रकरण में संजीव मित्तल की कार्यशैली और भेदभाव पूर्ण रवैये को लेकर इस चुनावी समय में प्रदेश के 18 लाख कर्मचारियों में आक्रोश और नाराजगी है. दरअसल केंद्र सरकार ने 1 जनवरी से अपने कर्मचारियों का डीए 9% से बढ़ाकर 12% कर दिया और प्रदेश सरकार भी अपने कर्मचारियों को केंद्र के बराबर डीए देती है. ऐसे में प्रमुख सचिव वित्त संजीव मित्तल ने अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों (आईएएस,आईपीएस,आईएफएस) भुगतान का शासनादेश चुनाव आचार संहिता की अटकलों के बीच 6 मार्च को जारी कर दिया लेकिन प्रदेश के लाखों कर्मचारियों को महंगाई भत्ते का भुगतान करने पर कोई निर्णय नहीं लिया. अब चुनाव आचार संहिता लागू हो जाने से कर्मचारियों को डीए मिलना संभव नहीं होगा इससे सूबे के कर्मचारियों और अधिकारियों में नाराजगी है.

आलोक कुमार आईएएस 1988 बैच, चेयरमैन पावर कारपोरेशन व प्रमुख सचिव ऊर्जा

शक्ति भवन में मुख्यमंत्री स्तर की सुरक्षा व्यवस्था के साथ बैठने वाले इन जनसेवक से मिलना तो दूर बात करना भी नामुमकिन होता है. चाहे वह अफसर हो, या मीडिया से जुड़ा व्यक्ति हो या फिर कोई जनता से जुड़ा व्यक्ति सबको साहब के स्वनिर्मित प्रोटोकाल से चलना पड़ता. अगर आपको मिलना हो तो पहले इनके सचिव से मिलकर लिखित में अपना परिचय और प्रयोजन दीजिये फिर यदि वह चाहेंगे तो मिलने का समय देंगे. बिजली विभाग में विगत वर्ष हुए यदि 3 महत्वपूर्ण प्रकरणों पर क्रमवार नजर डालें तो इनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े होते हैं.

  1. 14 अक्टूबर 2018 को ओबरा परियोजना में लगी आग जिसने उत्पादन निगम का करीब 500 करोड़ रुपया स्वाहा कर दिया था. आग के कारणों की जांच में दोषी पाए गए प्रोबेशन पर आये विद्युत् उत्पादन निगम के निदेशक कार्मिक संजय तिवारी को बचाने में शिथिलता प्रमुख सचिव ऊर्जा अलोक कुमार के स्तर से की जा रही थी. अंत में काफी दबाव के बाद रिटायरमेंट के दिन संजय तिवारी को चार्जसीट दी गयी. आग के कारणों की जांच के लिए बनी कमेटी की रिपोर्ट में 4 लोगों को दोषी पाया गया था. उनमें 3 पर प्रबंध निदेशक सैंथिल पांडियन के स्तर से कार्यवाही काफी पहले ही की जा चुकी थी. अग्निकांड के दोषियों में से एक संजय तिवारी का पद निदेशक कार्मिक होने के नाते शासन का है इसलिए उसको चार्जशीट देने के पहले जांच कमेटी को शासन से अनुमति लेना आवश्यक था. इसलिए अनुमति हेतु कमेटी द्वारा प्रमुख सचिव उर्जा को एक पत्र 21 जनवरी 2019 को भेजा गया, जिसपर प्रमुख सचिव द्वारा 24 जनवरी को कुछ बिन्दुओं पर आपत्ति दर्ज करते हुए उस पर कमेटी से साक्ष्य मांगे गए थे. कमेटी ने साक्ष्यों के साथ उसका जवाब भी 24 जनवरी को प्रमुख सचिव उर्जा अलोक कुमार को भेज दिया था लेकिन अलोक कुमार द्वारा संजय तिवारी को चार्जसीट देने में देरी किये जाने से उनकी मंशा पर सवाल खड़े होने शुरू हो गए. अंततः “अफसरनामा” के दबाव में उनको चार्जसीट देना ही पड़ा.
  2. अफसरों की कार्यशैली से किरकिरी का दंश झेल रही योगी सरकार के लिए अलोक कुमार का विभाग में तैनात संविदाकर्मियों के अंतर तहसील तबादले का आदेश दिया गया था जोकि किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है, खासकर चुनावी मोड में आ चुकी सरकार के लिए तो बिलकुल ही नहीं. अलोक कुमार द्वारा संविदाकर्मियों को अंतर तहसील तबादले का दिया गया आदेश बिलकुल ही नियमविरुद्ध और तर्कहीन था. जब संविदाकर्मी निगम के कर्मचारी हैं ही नहीं तो तबादले का आदेश कितना तर्कसंगत है यह समझने के लिए काफी है.
  3. जवाहरपुर परियोजना की सरिया चोरी प्रकरण में जिसमें तत्कालीन परियोजना प्रबंधक यूएस गुप्ता सहित कुल 4 विभागीय अफसरों की संलिप्तता की बात सामने आयी थी और चोरी के इस पूरे ख़ेल को एक अंतर्राज्यीय दुजाना गैंग द्वारा किये जाने की भी रिपोर्ट आई थी. ऐसे परियोजना प्रबंधक को “अफसरनामा” की खबर के दबाव के चलते बड़ी मुश्किल से तत्कालीन एमडी अमित कुमार ने जवाहरपुर से हटाकर मुख्यालय पर प्रगति ईकाई का मुखिया बना दिया. ताज्जुब की बात यह है कि इस पूरे प्रकरण की मानीटरिंग खुद मुख्यमंत्री सचिवालय से किये जाने की जानकारी थी उसके बाद भी एक चोरी में शामिल अफसर को करीब 1500 करोड़ की यूनिट का मुखिया बनाये जाने पर ये चुप्पी साधे रहे जबकि इस बात की लिखित शिकायत अलोक कुमार के पास किये जाने की जानकारी है.

शशि प्रकाश गोयल आईएएस 1990 बैच, प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री

ठाकुरवाद का दंश झेल रहे योगिराज में वैश्य (बनिया) समाज के आईएएस मनमर्जी चला रहे हैं. लगभग हर राज में मलाईदार पदों पर ही रहने वाले ये अफसर योगिराज में भी अपनी मर्जी के बादशाह बने बैठे हैं. उत्तर प्रदेश का प्रभारी बन पर्दे के पीछे से सरकार चलाने वाले अपने ही समाज के एक राजनेता के चलते बणिक वर्ग के ही गोयल  सबसे पावरफुल पंचम तल पर उच्च पदस्थ हैं और इन सबके सरगना बने हुए हैं.

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