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करोड़ो की बंदरबांट करने वाले पीडब्लूडी इंजीनियरों पर विधानसभा की टेढ़ी नजर, कारवाई तय

#पीडब्लूडी ही नही आऱईएस जैसे विभाग भी नपेंगे लोक लेखा समिति की अगली खेप में.  

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में सरकारी पैसे से निर्मित होने वाली योजनाओं के बचे पैसे को वापस न कर मनमर्जी से खपाने वाले पीडब्लूडी के सैकड़ों इंजीनियर योगी सरकार के रडार पर आ गए हैं. विधानसभा की लोकलेखा समिति ने सरकारी पैसे के इस तरह से सरासर दुरुपयोग को लेकर चिंता जताते हुए रिपोर्ट मांगी है जिसे इसी महीने समिति के सामने रखा जाना है. अंदरखाने की खबर है कि लंबे समय से सरकारी पैसों का वारा न्यारा कर रहे इंजीनियरों नें जांच में माकूल रिपोर्ट लगवाने, कारवाई से बचने और लोक लेखा समिति को गुमराह करने के लिए गिरोह बनाकर खासी रकम जुटा जांच को प्रभावित करने की तैयारी कर ली है. इस फर्जीवाड़ें में पीडब्लूडी के अधिशासी व उपर के स्तर के सैकड़ों इंजीनियरों पर कारवाई की तलवार लटक सकती है.

पीडब्ल्यूडी में विभिन्न योजनाओं के निर्माण कार्यों के बाद वर्षवार बची हुई धनराशि को राज्य के राजस्व खाते में जमा कराया जाना अपेक्षित था लेकिन इस धनराशी को विभाग के अधिशाषी अभियंताओं द्वारा डकार लिया गया. पीडब्ल्यूडी में बची हुई धनराशी के इस बंदरबांट ने पीएम मोदी और सीएम योगी के दावों पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है. लोक लेखा समिति के सदस्य और गोरखपुर से विधायक राधा मोहन अग्रवाल के द्वारा यह मुद्दा उठाया गया. इस पर उनका कहना है कि मुझे बताया गया है कि विभाग द्वारा एक पत्र सभी जिलों को भेजा जा चुका है कि वह बचे हुए धन को राज्य के राजस्व में जमा करा दें. श्री अग्रवाल के अनुसार यदि यह मुद्दा बड़े पैमाने पर उठाया जाता है तो जांच बहुत बड़ी होगी. ऐसे में केवल 0-10% तक की बचत धनराशी की जांच की जाय तो वह भी करोड़ों में होगी.

पीडब्ल्यूडी में प्रत्येक निर्माण कार्य में ऐसे निर्माण कार्य जिनमें 0% से लेकर 10% तक की बचत हुई है, यदि उसकी सूची बनाई जाती है तो यह राशि कई करोड़ों में होगी. लेकिन राज्य सरकार के राजस्व खाते में धेले भर की रकम भी जमा नहीं की गई. जबकि नियमानुसार निर्माण कार्य में से बची धनराशि का समर्पण उसी वित्त वर्ष में कर दिया जाना चाहिए था.  पिछले 2 वर्षों में विभिन्न खंडों को बजट आवंटित किया गया था जिसका निर्धारित मदों में उपयोग न होने पर इसको विभाग में सरेंडर करने का नियम है, लेकिन डेढ़ सौ से ज्यादा एक्सईएन ने इसे सरेंडर करने के बजाय कहीं और खर्च कर दिया. करोड़ों की यह राशि कहां खर्च की गई इसका कोई विवरण मुख्यालय के पास भी नहीं है. कैग के वित्तीय अनुशासन के तहत इसको बड़ी अनियमितता भी माना जाता है.

लोक लेखा समिति के आदेश से पीडब्ल्यूडी में बवाल मचा और प्रकरण को मैनेज करने की कवायद भी की गयी. डेढ़ सौ से ज्यादा अधिशासी अभियंताओं यानी एक्सईएन ने बचत की रकम को निर्धारित विभागीय मद में समर्पित करने के बजाय मनमाने ढंग से खर्च कर दी है. मामले का खुलासा होने पर शासन ने आनन-फानन में जांच बैठा दी और संबंधित अभियंताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. इस पूरे प्रकरण पर धीमी कार्रवाई पर शासन की रहस्यमई चुप्पी को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. हांलाकि सूत्रों के मुताबिक़ अब इस प्रकरण में सरकार किसी बड़े कार्यवाही की तैयारी में है.  लोक लेखा समिति में प्रकरण में चर्चा के बाद मुद्दा गरमाया तो शासन ने डेढ़ सौ से अधिक अधिशाषी अभियंताओं के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी है.

शासन की  जानकारी में मामला आने पर अनुशासन अपील नियमावली 1999 के नियम 10 (2) के तहत सभी अधिशाषी अभियंताओं के खिलाफ जांच बैठा दी. गत वर्ष के सीएजी ऑडिट में करीब 70 हजार करोड़ रुपए की धनराशि के निर्माण कार्यों की यूसी भी नहीं भेजी गई थी. जिसके संबंध में सरकार के कबीना मंत्री सिद्धार्थ ने सिंह को मीडिया के सामने आकर यह बयान देना पड़ा था कि सीएजी   द्वारा उठाई गई यह आपत्ति गंभीर है और सरकार इसकी जांच कराकर कठोर कार्रवाई करेगी. लेकिन अभी तक उनका यह बयान केवल बयान ही साबित हुआ हकीकत नहीं हो पाया है.

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