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ओबरा अग्निकांड के आरोपी संजय तिवारी पर आलोक कुमार का करम, न एफआईआऱ, न सजा महज 10 फीसदी पेंशन कटौती

#सरकार की मंशा को ईमानदार अलोक कुमार दिखा रहे ठेंगा, संविदा कर्मियों को अंतर तहसील तबादले का आदेश देने वाले अलोक कुमार संविदा पर चल रहे निदेशक कार्मिक संजय तिवारी पर मेहरबान.

#निदेशक कार्मिक संजय तिवारी एक फंड डायवर्जन के मामले में भी दोषी, जल्द ही मिल सकती है चार्जसीट.

#वर्ष 2016 में ओबरा की इकाई 7 में 100 करोड़ का R&M संजय तिवारी की देख रेख में हुआ, लेकिन यूनिट चलने के पूर्व ही हो गयी स्वाहा, पूरे मामले को पचा लिया गया.      

अफसरनामा ब्यूरो  

लखनऊ : आरोप साबित हो चुका, रिपोर्ट आ गयी पर सरकारी बिजलीघर को फूंकने का दोषी प्रमुख सचिव की छांव तले मौज में है. संविदा पर तैनात ओबरा अग्निकांड का आरोपी निदेशक कार्मिक संजय तिवारी ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव आलोक कुमार की मेहरबानी से न केवल बर्खास्तगी, एफआईआऱ से बच निकला बल्कि महज पेंशन में 10 फीसदी कटौती की सांकेतिक सजा मुकर्रर करवा योगी व मोदी सरकार की जीरो टालरेंस नीति को ठेंगा दिखा रहा है.

जिस भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों पर केंद्र की मोदी और प्रदेश की योगी सरकार कठोरतम कार्यवाही कर रही है और भ्रष्टाचारी अफसरों को नौकरी तक से भी निकालने में गुरेज नहीं कर रही है, वहीँ योगी सरकार के ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव आलोक कुमार, उत्पादन निगम के निदेशक कार्मिक संजय तिवारी पर रहम दिल बने हुए हैं. ओबरा अग्निकांड में जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई के करीब 500 करोड़ रुपए भ्रष्टाचार के चलते स्वाहा हो गए थे और उसकी जांच में निदेशक कार्मिक संजय तिवारी को आरोपी बनाया गया व दोष सिद्ध हुआ. जांच में दोषी पाए जाने और चार्जसीट देने के बाद भी बर्खास्त करने और FIR दर्ज कराने की बजाय 10% पेंशन कटौती की सजा निर्धारित कर उस पर इनायत बरत रहे हैं. इसके अलावा “अफसरनामा” द्वारा लगातार संजय तिवारी को तबादला सीजन इंज्वाय कराने जैसा आरोप लगाया गया जोकि अभी के तबादला सीजन में 2003 बैच के इंजीनियरों के तबादला न किये जाने से साफ़ हो जाता है.

बताते चलें कि संजय तिवारी को दी गई चार्जसीट की कॉपी “अफसरनामा” के पास उपलब्ध है, जिसमें जांच कमेटी द्वारा उनको चार बिंदुओं में गंभीर तो दो में आंशिक रूप से दोषी पाया गया है. जिसके आधार पर जानकारों का मानना है कि संविदा पर चल रहे संजय तिवारी पर सेवा शर्तों के उल्लंघन और गंभीर कदाचार का मामला साबित होने के बाद इनको निदेशक पद से हटाना उचित होगा लेकिन ओबरा अग्निकांड में जनता के पैसे को स्वाहा करने वाले इस जिम्मेदार पर FIR करने और पद से हटाने के बजाय उसको बचाने का काम शासन द्वारा किया जा रहा है. ओबरा अग्निकांड के करीब 1 साल पूरा होने को हैं और तत्कालीन गठित जांच कमेटी द्वारा जांच के बाद चार्जसीट सौंपे हुए 2 महीने से ज्यादा का समय बीत गया है, ऐसे गंभीर प्रकरण में जांच के बाद कार्यवाही में देरी, और 2 महीने बाद केवल 10% पेंशन में कटौती बहुत कुछ बयां करती है.  

इसके अलावा मिली जानकारी के मुताबिक़ एक फंड डायवर्जन के मामले में भी संजय तिवारी दोषी पाए गये हैं जिसकी जांच जमुना शुक्ला फर्म द्वारा की गयी थी. इस मामले में भी जल्द ही संजय तिवारी को चार्जसीट दी जा सकती है. इसके अलावा अलोक कुमार के राज में उत्पादन निगम में न्याय के नैसर्गिक सिद्धांत की भी अनदेखी की जा रही है. अनपारा “डी” मामले में जिन 13 लोगों को दण्डित किया गया है उनके दंड का निर्धारण खुद दोषसिद्ध आरोपी संजय तिवारी द्वारा किया गया है. अलोक कुमार के राज में उत्पादन निगम की इस दंड प्रक्रिया को केवल अंधेरगर्दी का ही नाम दिया जा सकता है कि न्याय के सिद्धांत से विपरीत एक दागी व्यक्ति दूसरे दागियों को सजा देने का काम कर रहा है. सवाल यह है कि जब संजय तिवारी पर दोष सिद्ध पहले हो जाता है और सजा की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है तो संजय तिवारी किस अधिकार से दूसरों को आरोप पत्र और सजा का निर्धारण कर सकता है.

यही नहीं वर्ष 2016 में एक अन्य मामले में ओबरा की इकाई 7 जिसमें 100 करोड़ का R&M संजय तिवारी की देख रेख में कराया लेकिन यूनिट चलने के पूर्व ही यह आग से स्वाहा हो गयी, जिससे उसमें एक भी यूनिट बिजली का उत्पादन नहीं किया जा सका था. इस इकाई को प्रदूषण की आड़ में बीएस तिवारी को मिलाकर बंद करा दिया गया और पूरे मामले को तत्कालीन निदेशक तकनीकी बीएस तिवारी और तब सीजीएम रहे और वर्तमान में निदेशक कार्मिक संजय तिवारी ने मिलकर यूनिट को खत्म करा दिया, जिसमें पैसों की खूब बन्दर बाँट हुई.

संजय तिवारी जैसे लोगों को बचाना या फिर उन पर रहम दिल दिखाना योगी और मोदी के नेक नीति को ठेंगा दिखाना है. योगी सरकार की कार्यशैली और संजय तिवारी पर लिया गया आलोक कुमार का यह फैसला कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता बल्कि भ्रष्टाचारियों के बच निकलने का मार्ग प्रशस्त करने जैसा है. जबकि ऐसे गैर जिम्मेदार अफसर को तत्काल प्रभाव से बाहर का रास्ता दिखा देना कतई अनुचित भी नहीं होगा, क्योंकि अभी भी संजय तिवारी प्रोबेशन पर ही है और साथ ही साथ वह अपनी सेवा शर्तों का भी उल्लंघन किया है.

बताते चलें कि ओबरा अग्निकांड के कारणों की जांच जब गठित कमेटी द्वारा की गयी तो परियोजना निर्माण के समय BHEL द्वारा सुरक्षा उपायों को लेकर हाथ खड़ा करने के बाद तत्कालीन परियोजना सीजीएम संजय तिवारी द्वारा कोई भी एहतियात नहीं बरता गया और न ही इसके लिए कोई प्रभावी कदम उठाया गया था. फिलहाल संजय तिवारी आरोपी ही नहीं बल्कि चार्जसीट व सजा पाए अपराधी है. ऐसे में उस पर की गई कार्यवाही कतई उचित और न्यायोचित प्रतीत नहीं होती.

2003 बैच के इंजीनियरों का तबादला रुका कैसे, किस तरह निदेशक कार्मिक ने बदला पैतरा, और कौन-कौन रहा इसमें शामिल…….पढ़िए अगले अंक में.     

ओबरा “ब” में 14.10.18 के अग्निकांड के बाद संजय तिवारी के विरुद्ध जाँच संस्थित किये जाने के सम्बन्ध में आदेश जिसमें यह साफ़ लिखा है कि यह अभी संविदा पर हैं. 

चार्जशीटेड, प्रोबेशन पर चल रहे संविदा वाले निदेशक पर मेहरबान सुशासन सरकार के पहरेदार आलोक कुमार

संजय तिवारी के कारनामों के कुछ उदाहरण जोकि इनकी कार्यशैली को समझने के लिए काफी हैं  –

चुनाव निपटे पर आरोपी निदेशक संजय तिवारी नही निपटा, प्रोबेशन पर है फिर भी नहीं हटा

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