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राजधानी लखनऊ के एसएसपी रहे विवादित आईपीएस अधिकारी यशस्वी यादव को “कंपल्‍सरी लीव”

अफसरनामा ब्यूरो
मुम्बई : पिछली अखिलेश सरकार में उत्तर प्रदेश में डेप्यूटेशन पर आये और राजधानी लखनऊ के एसएसपी रहे आईपीएस अधिकारी यशस्वी यादव बेआबरू होकर वापस अपने मूल कैडर महाराष्ट्र पहुँचने के बाद अब फिर से अपने कारनामों को लेकर चर्चा में हैं. महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडणवीस ने उन्हें ‘कंपल्‍सरी लीव’ पर भेज दिया है. 7 मार्च को औरंगाबाद के बाहरी क्षेत्र में कूड़ा फेंकने को लेकर हुई हिंसा के मामले में यशस्वी यादव की भूमिका काफी विवादित रही और विपक्ष इसे मुद्दा बनाकर पांच बार महाराष्ट्र विधानसभा की कार्यवाही ठप करा दी. विपक्ष ने मांग की थी कि यशस्वी को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए. औरंगाबाद में हुई हिंसा के मामले में यशस्वी पर महिलाओं और बच्चों को घर से निकालकर पीटने का आरोप है. यशस्वी यादव का यह अंदाज कोई नया नहीं है, अपने उत्तर प्रदेश के डेप्युटेशन पर भी उन्होंने ऐसा ही कारनामा कानपुर मेडिकल कॉलेज में कर दिखाया था, जब उन्होंने तत्कालीन सपा विधायाक इरफान सोलंकी से मिलीभगत कर डॉक्टरों की नृशंस पिटाई की थी.

इस मामले में विधानसभा में बयान देते हुए महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस ने बताया कि इस 7 मार्च को औरंगाबाद के बाहरी क्षेत्र में कूड़ा फेंकने को लेकर जो हिंसा हुई थी, उसकी जांच के लिए एक दो सदस्यीय कमिटी का गठन किया गया है. ये जांच कमिटी एक महीने के भीतर सरकार के सामने अपनी रिपोर्ट पेश करेगी. इस रिपोर्ट के नए के बाद सरकार दोषियों के खिलाफ कारवाई करेगी. इसी जांच के चलते सरकार ने यशस्वी यादव को ‘कंपल्‍सरी लीव’ पर भेजा गया है. यशस्वी के छुट्टी पर जाने के बाद औरंगाबाद के पुलिस कमिश्नर का चार्ज औरंगाबाद के आईजी देखेंगे.

यशस्वी यादव पर आरोप है कि उनके कहने पर पुलिस ने घर से निकाल कर बच्चों और महिलाओं को पीटा गया और इसके बाद पुलिस ने सबूत नष्ट करने के लिए खुद ही इलाके के सीसीटीवी कैमरे तोड़ डाले और पुलिस डिपार्टमेंट की गाड़ियों को खुद ही तोड़ डाला बता दें, यशस्वी यादव को महाराष्ट्र बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राव साहेब दानवे पाटिल की सिफारिशी चिट्ठी पर सीएम देवेंद्र फडणवीस ने यशस्वी यादव को ठाणे के एडिशनल पुलिस कमिश्नर पद से औरंगाबाद पुलिस कमिश्नर पद पर ट्रांसफर किया था. यशस्वी अपनी नौकरी के दौरान कई बार जांच के दौरान दोषी पाए गए और हमेशा राजनितिक रसूख के चलते बचते रहे हैं. इससे पहले यूपी में भी कानपुर मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों पर हुए लाठीचार्ज के मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कोई कर्रवाई करने के बजाय उन्हें इनाम देते हुए लखनऊ का एसएसपी बना दिया था. बता दें पूर्व सीएम अखिलेश यादव और यशस्वी यादव सैनिक स्कूल में क्लासमेट्स रहे हैं, जिसका फायदा यशस्वी अपने यूपी डेप्युटेशन के दौरान जमकर उठाते रहे. कानपुर जैसे बड़े जिले के एसएसपी बनने के यशस्वी यादव ने ऐसा काम किया जो पूरे यूपी में आईपीएस कैडर के लिए काले अध्याय के रूप में जाना जाएगा.

यशस्वी यादव पर सपा विधायक इरफान सोलंकी के साथ कानपुर हैलट अस्पताल के डॉक्टरों से हुए विवाद के बाद समाजवादी पार्टी कार्यकर्ता की तरह काम करने के आरोप लगे थे. यह यशस्वी यादव का ही कारनामा था कि पूरे प्रदेश में डॉक्टरों को हड़ताल करने पड़ी और 50 से अधिक बेगुनाह मरीज मौत के मुंह में समा गए. कोर्ट की दखल के बाद कानपुर से हुई विदाई हैलट कांड के बाद यशस्वी यादव सरकार की सरपरस्ती के भरोसे बैठे थे, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरे मामले का स्वत: संज्ञान लिया और राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए न्यायिक जांच के आदेश दिए. कोर्ट ने कानपुर रेंज के आईजी, डीआईजी और एसएसपी को हटाने का आदेश दिया तब जाकर उन पर कार्रवाई हुई. इस पूरे प्रकरण में यशस्वी याद ने अपने बाल सखा सीएम अखिलेश यादव की जमकर किरकिरी कराई.

यशस्वी यादव ने कानपुर से हटाये जाने के बाद भी सबक नहीं लिया, जबकि सीएम अखिलेश यादव ने एक बार दोस्ती की खातिर उनपर भरोसा जताते हुए राजधानी लखनऊ का कप्तान बना दिया. यशस्वी यादव यहाँ भी अति-उत्साह में फैसले लेते रहे और फर्जी खुलासे करते रहे. यहां तक कि उन्होंने एक एयरगन के कारोबारी को बड़े हथियारों का सौदागर बता दिया. उनके इस खुलासे में कई खामियां नजर आईं. यही नहीं लखनऊ यूनिवर्सिटी के पास बाबूगंज में एचडीएफसी बैंक में 50 लाख रुपयों की लूट और 3 हत्याओं का खुलासा करने में नाकाम रहे. एक दिन इन्ही यशस्वी यादव ने अचानक तेलंगाना में मारे गए सिमी आतंकियों के सर पर लूट हत्या का ठीकरा फोड़कर अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश की. लेकिन उन्हीं के सीनियर अफसरों ने उनकी इस थ्योरी की हवा निकाल दी. यशस्वी यादव की लचर पुलिसिंग व्यवस्था का ही नतीजा है कि लूट और हत्या की इतनी बड़ी घटना लखनऊ पुलिस के लिए आजतक अनसुलझा रहस्य बनी हुई है. ऐसा नहीं है कि यशस्वी ने अपने गृह कैडर यूपी में डेप्युटेशन आने के बाद विवादों से दोस्ती की हो.

यशस्वी अपने मूल कैडर महाराष्ट्र में भी गलत कारणों से सुर्खियों में बने रहे. यहां तक कि वहां भी हाईकोर्ट ने उन्हें नौकरी से निकाले जाने के आदेश दे दिए थे. लेकिन यशस्वी ने एनसीपी के नेताओं की नजदीकी के चलते बच गए. कोल्हापुर पुलिस प्रशिक्षण कैंप में एक सेक्स स्कैंडल में उनकी नौकरी जाते-जाते बची थी. इस प्रशिक्षण स्कूल में हुए कांड में एक अविवाहित प्रशिक्षु गर्भवती पायी गयी थी. इस मामले ने पूरे महाराष्ट्र में खलबली मचा दी थी. बाद में यशस्वी यादव सहित कई अफसर निलंबित किये गये थे. यही नहीं 2007 में जब यशस्वी नागपुर में तैनात थे तो उन्होंने डकैतियों की जांच करने पहुंची ठाणे पुलिस टीम को हिरासत में लेने का आदेश दे दिया. यही नहीं उन पर पेट्रोल में मिलावट करने वाले केमिकल के अवैध व्यापार में लिप्त होने का भी आरोप भी लगा था. इन दोनों मामलों के जांच महाराष्ट्र के तत्कालीन डीजीपी डॉ. पीएस पसरीचा ने जांच करवाई थी, जिसमे यशस्वी दोषी भी पाए गए, लेकिन एक बार फिर अपने राजनितिक रसूख के चलते बच गए थे. यहीं नहीं मुंबई में पुलिस कर्मियों के परिजनों के कल्याण के लिए एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित हुआ, यशस्वी यादव ने इस कार्यक्रम के टिकट प्राइवेट लोगों को बेच दिए थे.

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