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सरकार को है धन की दरकार लेकिन बचत की बड़ी रकम पड़ी बेकार

#योजना बंद करने का हुआ एलान लेकिन अवशेष धनराशि का ब्योरा नदारद.

अफसरनामा ब्यूरो  

लखनऊ : राज्य के राजस्व में अप्रत्याशित कमी और सीमित वित्तीय संसाधनों की स्थिति में  भी कोविड-19 महामारी की रोकथाम और जनहित के अन्य कार्यों हेतु संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चत करने के लिये सरकार द्वारा सांसद निधि और विधायक निधि जैसी योजनाओं को स्थगित किये जाने और अपरिहार्य स्थितियों को छोड़कर निर्माण कार्य की किसी नयी योजनाओं की स्वीकृति से इंकार के खुले एलान सहित राज्य कर्मचारियों के भत्तों में कटौति जैसे कठोर निर्णय लिये गये हैं और लोक निर्माण विभाग में सलाहकार की नियुक्ति किये जाने की कवायद भी शुरू की जा रही है.

सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन में यह भी कहा गया है कि विभागों के पास जो बजट उपलब्ध है उसे उन्ही निर्माण कार्यों पर खर्च किया जाये जो पहले से शुरू किये जा चुके हैं. सरकार कृषि जैसे महत्वपूर्ण विभाग में गैर जरूरी योजनाओं को बंद कर धन प्रबंधन की संभावनाएं तलाश रही है. लेकिन अभी तक जो योजनाएं बंद की जा चुकी हैं उनमें अवशेष के रूप में बची धनराशि के बारे में कोई दिशा निर्देश न दिये जाने पर जानकारों द्वारा आश्चर्य जताया जा रहा है.

जबकि वर्तमान में सूबे की नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली योगी टीम-11 के सदस्यों में से अधिकतर सदस्य इंजीनियरिंग की विधा और विभागों से अच्छी तरह वाकिफ हैं. लेकिन इंजीनियरिंग विभागों में टाईम एक्सटेंशन, रेट रिवीजन और एक्स्ट्रा आईटम जैसे उपायों /कार्यों जिनकी गूँज लोक लेखा समिति में काफी दिनों तक बनी रही थी. फिर भी इसके सम्बन्ध में कोई असरदार निर्णय अभी तक नहीं ले पाए हैं. जिसके कारण सूबे में निर्माण कार्यों के पूरा हो जाने के बाद बची धनराशी और योजनाओं के बंद होने के बाद सरकारी खजाने में बची रकम का न पहुँच पाना जैसे मुद्दे समय समय पर उठते रहे हैं. इसमें महतवपूर्ण यह भी है कि जब योजनायें बंद होती हैं तो उस समय उन योजनाओं में बची हुई   धनराशी एक समय बाद न के बराबर रह जाती है.

इंजीनियरिंग विभागों व् निगमों में होनेवाली बंदरबांट पर लगाम लगाने की ठोस पहल का सूबे को अभी तक इंतजार ही है जो अचरज का सबब है. सांसद निधि, विधायक निधि, त्वरित आर्थिक विकास निधि, लोहिया योजना, अम्बेडकर योजना की बचत की धनराशि कहां गयी इसका कोई आंकड़ा वित्त विभाग के पास नहीं है. सूबे में विभागों और निगमों में बचत के तमाम मामले मौजूद हैं. करीब एक साल पहले के पीडब्ल्यूडी विभाग के एक चर्चित मामले में जिसकी योजनाओं के बचत की धनराशि को वापस न किये जाने और उसको गलत तरीके से खपाने की खबर चर्चा में आई थी और सरकार ने इस आशय का एक दिशा निर्देश जारी किया था लेकिन आज तक सरकार के वित्त विभाग के पास इस बात का कोई मैकेनिज्म नहीं है कि बन्द हुई योजनाओं की कितनी बचत की धनराशि कहां पर है.

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कर्मचारियों के वेतन भत्ते जैसे राजनीतिक नजरिये से जोखिमपूर्ण निर्णय लिए जाने से जानकार सवाल तो उठा ही रहे हैं और इस मामले में सरकार को अफसरों द्वारा अँधेरे में रखे जाने की बात कह रहे हैं. प्रायः निर्माण कार्यों में सरकार की एस्टिमेटेड कास्ट और टेंडर की कास्ट में 5 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक के अंतर कि बात पर लोक लेखा समिति कि बैठकों में काफी मंथन हो चुका है. लेकिन यह धनराशि कहां है या कहां जाती है इस पर वित्त विभाग का कोई नियंत्रण फिलहाल नहीं दिखता है. बचत की अरबों की धनराशि के वारे-न्यारे पर शासन के वित्त विभाग के प्रतिनिधि के तौर पर तैनात वित्तीय प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों का मौन भी इस मामले में कम दिलचस्प नहीं है. ऐसे में किसी बंद योजना की बचत की धनराशी जोकि एक अंतराल के बाद शून्य हो जाती है पर किसी ठोस पहल न करना सवालों के घेरे में है. मिली जानकारी के अनुसार पीडब्ल्यूडी विभाग में बचत धनराशी का मुद्दा लोक लेखा समिति में उठाये जाने के बाद सरकार द्वारा बचत की धनराशी को लेकर आदेश जारी तो किया गया लेकिन पुरानी बंद योजनाओं में बचत की धनराशी का लेखाजोखा वित्त विभाग के पास न होना भी बड़ा सवाल है.

सूबे के इंजीनियरिंग विभागों का आलम यह है कि सूबे के 2 बड़े विभागों में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के कामों में हुई गड़बड़ी की जांच eow से कराने के आदेश सरकार को देने पड़े थे. लेकिन पिछले वर्ष शुरू हुई यह जांच अभी तक अंजाम तक नहीं पहुंच पाई है. जबकि  pwd के तत्कालीन विभागाध्यक्ष सेवानिवृत्त हो चुके हैं और ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के निदेशक 30 जून को अपना कार्यकाल पूरा करने वाले हैं. इसी बीच uprrda की आम सभा आगामी 8 जून को प्रस्तावित की गई है. अब देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस प्रकरण पर आगे क्या रुख तय करती है.

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