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सरकार के लिए सियासी संकट का सबब बन रहा अफसरों का रवैया, प्रमोशन में देरी को लेकर कर्मचारियों में बढ़ रही नाराजगी

#पीएसी जवानों के पहले से अधीनस्थ वित्त एवं लेखा सेवा संवर्ग में पदोन्नति की बाट जोह रहे कार्मिक.

#सहायक लेखाधिकारी के पद पर प्रमोशन की कार्यवाही युद्ध स्तर पर करने के दावे लेकिन नतीजा सिफर.

अफसरनामा ब्यूरो

लखनऊ : विपक्ष के रोजगार के मुद्दे पर युवाओं के असंतोष को अपने सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश के बाद बैकफुट पर आयी योगी सरकार रोजगार को लेकर गंभीर हुई और अगले ही दिन समस्त विभागों के प्रमुख सचिवों व अपर मुख्य सचिवों को इस बाबत निर्देश दिया कि अविलम्ब रूप से विभागों में खाली सरकारी पदों को भरा जाय. सीएम योगी ने खुद इसके लिए चयन आयोगों के अध्यक्षों के साथ भी एक बैठक किया.फिर भी अफसरशाही के रवैये में कोई बदलाव आता नहीं दिख रहा है. पीएसी के 900 जवानों के प्रमोशन को लेकर अफसरों के रवैये पर मुख्यमंत्री योगी नाराजगी जता चुके हैं और उनके प्रमोशन को जल्दी निपटाने के निर्देश भी दिए हैं. लेकिन अभी भी सरकारी महकमों के कुछ अफसर प्रमोशन में रोड़ा बने हुए हैं. सूबे की अफसरशाही का यह रवैया जहां विपक्ष को एक और मौका देगा वही भविष्य में सरकार के लिए सियासी नुकसान का सबब भी बन सकती है.

सूबे में अधीनस्थ वित्त एवं लेखा सेवा संवर्ग के पदोन्नति की बाट जोह रहे कार्मिकों की स्थिति देखकर तो फिलहाल यही लगता है. चयन वर्ष 2019-20 और 2020-21 में सहायक लेखा अधिकारी के कितने पद रिक्त हैं और उन पर पदोन्नति के लिए डीपीसी की कार्रवाई कब तक हो पाएगी यह कोई नहीं जानता और न ही जिम्मेदार इसको लेकर संजीदा हैं. हालांकि सरकारी महकमों में फाइलें तेजी से दौड़ती हैं और कार्यवाही युद्ध स्तर पर किए जाने के दावे भी किए जाते हैं पर नतीजा सिफर ही रहता है.

कभी सूबे के राज्यपाल ने जिन लेखाकारों को राज्य के खजाने का रक्षक बता कर जो हौसला अफजाई की थी उसी कैडर के डीपीसी के अटकाव और भटकाव के कारण पूरे संवर्ग में मायूसी घर कर रही है. वर्तमान निदेशक आंतरिक लेखा एवं लेखा परीक्षा संतोष अग्रवाल की तैनाती के बाद से डीपीसी विलंबित हुई है और वर्ष 2019-20 तथा वर्ष 2020-21 की डीपीसी शासन के वित्त विभाग के निर्देश के बावजूद संपन्न नहीं कराई जा सकी. आलम यह है की डीपीसी क्यों नहीं हो रही और प्रत्येक चयन वर्ष के लिए कितने पदों की डीपीसी की जानी है इसका कोई अता पता नहीं है. पारदर्शिता का अभाव और आंतरिक लेखा परीक्षा निदेशालय की तमाम चर्चित कारगुजारियां पहले भी सुर्ख़ियां बटोर चुकी हैं.

शासन ने भी पदोन्नति की कार्यवाही शीघ्र पूर्ण करने के निर्देश जारी कर दिए लेकिन सौ दिन चले ढाई कोस की तर्ज पर प्रमोशन की कार्यवाही को अमली जामा न पहना पाना अभी तक एक पहेली ही है. जिस वित्त सेवा के सर्वोच्च वेतनमान के अधिकारियों के दो चार पद खाली होने पर ही अपर मुख्य सचिव वित्त की नजर ए इनायत हो जाती है और शासन का वित्त विभाग आनन-फानन में डीपीसी कर पद पर तैनाती कर देता है, सूबे में आईएस और पीसीएस अफसरों की पदोन्नति समय पर हो जाती है तो फिर तृतीय श्रेणी के कार्मिकों के संबंध में इस लेटलतीफी और लालफीताशाही के लिए जिम्मेदार कौन है और इस जिम्मेदारी का अनुश्रवण कौन कर रहा है? इस सवाल का जवाब ढूंढा जाना जरूरी है.

बताते चलें कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश के लेखा एवं आडिट संवर्ग के बेहतरी के लिए आंतरिक लेखा एवं लेखा परीक्षा निदेशालय का गठन किया गया था और प्रदेश के समस्त विभागों के लेखा एवं आडिट के कर्मचारियों के नियुक्ति, प्रमोशन और स्थानान्तरण आदि का अधिकार निदेशक आंतरिक लेखा को दे दिया गया था. सरकार के इस फैसले के पीछे मुख्य उद्देश्य यह रहा था कि लेखा एवं आडिट के कर्मचारी जो विभागीय अधिकारियों के दबाव में रहते हैं जिसके कारण वे वित्त सम्बन्धी कार्यों को स्वतंत्र रूप से नहीं कर पाते. फलस्वरूप तमाम वित्तीय अनियमितताएं घटित होती रहती हैं. अगर इनको विभागीय अधिकारियों के नियंत्रण से मुक्त कर दिया जाय तो ये अपने कार्य को स्वतंत्र पूर्वक कर सकेंगे. लेकिन शासन ने जिस उद्देश्य से इस निदेशालय का गठन किया था वह उद्देश्य दूर की कौड़ी हो गया है और यह निदेशालय फिलहाल लेखा, आडिट के कर्मचारियों के लिए एक शोषण का अड्डा बन चुका है.

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