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योगिराज के वित्त विभाग में वणिक समाज, कर रहा राज, लेखा विभाग में चट प्रमोशन पट तैनाती

#जबकि वित्त एवं लेखाधिकारी का प्रमोशन वरिष्ठ लेखाधिकारी के पद पर और मुख्य वित्त लेखाधिकारी के पद पर होने के बाद भी तैनाती में गुजरता अरसा, अभी भी कई प्रमोशन पाए पद पर तैनाती की जोह रहे बाट.

#वित्त सेवा के अन्य कई विभागों में तैनात कई लेखाकार उसी विभाग में जिम्मेदारों की नजर से दूर, वर्षों से हैं जमा.

अफसरनामा ब्यूरो 

लखनऊ : योगीराज में प्रदेश के वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल, विभागीय प्रमुख सचिव संजीव मित्तल को लेखा एंव लेखा परीक्षा विभाग की मुखिया संतोष अग्रवाल से ज्यादा मुफीद और कौन हो सकता था. उत्तर प्रदेश का आंतरिक लेखा एवं लेखा परीक्षा विभाग की निदेशक संतोष अग्रवाल पर वित्त विभाग की मेहरबानी की बारिश इस कदर हुयी जो सरकार में नजीर बन गयी है. संतोष अग्रवाल को एक ही दिन में प्रमोशन देते हुए उसी दिन महज कुछ घंटों में निदेशक पद पर तैनाती भी दे दी गयी. इसके अलावा वित्त नियंत्रक के पद पर तैनात श्रीमती संतोष अग्रवाल के पति मुकुल अग्रवाल के हनक की भी चर्चा भी खूब है. जानकार बताते हैं कि मुकुल अग्रवाल की पोस्टिंग भी हमेशा से क्रीम कहे जाने वाले विभागों में ही रही है. यह महज संयोग भी हो सकता है लेकिन चर्चाओं की मानें तो इसके पहले वित्त नियंत्रक मंडी परिषद् के पद से अपने तबादले के बाद मुकुल अग्रवाल ने उस जगह पर अपनी पत्नी यानी लेखा परीक्षा विभाग की मुखिया बनाई गयीं संतोष अग्रवाल को तैनात कराने में कामयाब रहे थे.

स्थानांतरण का अड्डा बन चुके आंतरिक लेखा एवं लेखा परीक्षा निदेशालय के निदेशक के पद पर संतोष अग्रवाल की तैनाती में जिस तरह से तैनाती में तेजी दिखाई गयी है वह बड़े सवाल खड़ी करती है. प्रमोशन और तैनाती में अनियमितताओं का अम्बार बन चुके वित्त विभाग के जिम्मेदारों द्वारा संतोष अग्रवाल के लिए एक ही दिन में प्रमोशन और तैनाती का आर्डर जारी किये जाने से इस तबादला सीजन में तमाम तरह की चर्चाओं को जन्म दे रही है. जबकि शासन के वित्त विभाग के स्तर से वित्त एवं लेखाधिकारी का प्रमोशन वरिष्ठ लेखाधिकारी के पद पर और मुख्य वित्त लेखाधिकारी के पद पर होने के बाद भी तैनाती में अरसा गुजर जाता है जिनमें अभी भी कई अपने प्रमोशन पाए हुए पद पर तैनाती की बाट जोह रहे हैं.

ऐसे में यदि विभाग वाकई संजीदा होता तो निदेशक से नीचे के अधिकारियों की तैनाती में पारदर्शिता लाता. विभाग में कई पदों पर प्रमोशन तो हुए लेकिन प्रमोशन के बाद भी प्रमोशन पाया व्यक्ति अपनी पुरानी टेबल का काम देख रहा है तो कईयों के पास दो दो चार्ज हैं. इसके अलावा वित्त सेवा के अन्य कई विभागों में तैनात कई लेखाकार उसी विभाग में 20-25 वर्षों से जमे हुए हैं, इन पर विभाग के जिम्मेदारों की नजर नहीं है जबकि एक जगह जमकर ये अपनी दुकान चला रहे हैं.

इस प्रकार वित्त विभाग में वित्तीय अनुशासन और प्रभावी वित्तीय प्रबंधन की ब्यवस्था कैसे लागू होगी और सरकार की मंशा के अनुरूप वित्तीय प्रबंधन लालफीताशाही में अटक जाता है. वित्त विभाग की यह कमी आज से नहीं है पहले से चली आ रही इस कमी पर आजतक किसी का ध्यान नहीं गया और न ही इसको दूर करने के किसी उपाय के लिए कदम उठाये गए, जबकि विभाग की तेजी का आलम यह है कि इस तबादला सीजन में पिछली सरकार से तैनात चल रहे निदेशक राज प्रताप सिंह को हटाकर और आनन् फानन में संतोष अग्रवाल को तैनात कर दिया जाता है. योगी सरकार बनने के बाद से ही वित्त विभाग के मंत्री और अपर मुख्य सचिव के बीच अनबन की खबरें चर्चा में पहले भी रही थीं. जानकारों की मानें तो इस अनबन की शुरुआत भी तबादला सीजन में शुरू हुई और परिणामतः मंत्री जी वहीँ के वहीँ रहे और अधिकारी प्रमोशन पा गया.

इसके पहले भी “अफसरनामा” द्वारा आंतरिक लेखा एवं लेखा परीक्षा विभाग में चल रहे गोरखधंधे को प्रकाशित किया था. तब निदेशक राज प्रताप सिंह थे और निदेशक द्वारा स्थानांतरण नीति की धज्जियां उड़ाकर स्थानांतरण किया जा रहा था. उस समय राज प्रताप सिंह पर कोई उचित कार्यवाही नहीं की गयी. आज जब फिर तबादला सीजन शुरू हुआ तो आनन् फानन में निदेशक को हटा दिया गया और संतोष अग्रवाल को तैनात कर दिया गया.

बताते चलें कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश के लेखा एवं ऑडिट संवर्ग के बेहतरी के लिए आंतरिक लेखा एवं लेखा परीक्षा निदेशालय का गठन किया था और प्रदेश के समस्त विभागों के लेखा एवं ऑडिट के कर्मचारियों के स्थानांतरण आदि का अधिकार निदेशक आंतरिक लेखा को दिया गया था.  सरकार के इस फैसले के पीछे मुख्य उद्देश्य यह रहा था कि लेखा एवं ऑडिट के कर्मचारी जो विभागीय अधिकारियों के दबाव में रहते हैं जिसके कारण वे वित्त संबंधी कार्यों को स्वतंत्र रूप से नहीं कर पाते फलस्वरुप तमाम वित्तीय अनियमितताएं घटित होती रहती हैं, अगर इनको विभागीय अधिकारियों के नियंत्रण से मुक्त कर दिया जाय तो ये अपने कार्य को स्वतंत्र पूर्वक कर सकेंगे. लेकिन शासन ने जिस उद्देश्य से इस निदेशालय का गठन किया वह उद्देश्य तो दूर की कौड़ी रह गई तथा यह निदेशालय दूसरी दिशा में चल पड़ा. लेखा एवं ऑडिट के कर्मचारियों के लिए यह एक शोषण का अड्डा बन गया है जो भी निदेशक यहां आया उस का एकमात्र उद्देश्य कर्मचारियों को स्थानांतरण का भय दिखाकर पैसे का दोहन किया जाना रहा तथा मनमाने तरीके से स्थानांतरण कर कर्मचारियों को परेशान किया गया. इसी कारण पूर्व निदेशक श्री भोला सिंह यादव के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति एवं अनियमित कार्यों की विजिलेंस जांच भी वर्तमान सरकार द्वारा शुरू की गई है. कुछ इसी तरह का कार्य निदेशक रहे राज प्रताप सिंह द्वारा भी सरकार द्वारा घोषित स्थानांतरण नीति की धज्जियां उड़ाते हुए स्थानांतरण किए गये थे. इनके द्वारा लगभग 700 कर्मचारियों का स्थानांतरण किया गया था.

लेकिन तब से लेकर अब तक राजप्रताप सिंह को हटाने की कार्यवाही नही की जा सकी. और अब जबकि सरकार की स्थानांतरण नीति के तहत ट्रांसफर करने के लिये विभागाध्यक्ष के पास 1 सप्ताह का वक्त बचा है तो इस पद परिवर्तन से क्या परिवर्तन होता है यह देखने वाली बात होगी.

क्योंकि एक ओर कई विभागों में 20-25 सालों से कुंडली मारे लेखाकार जमे हैं और जिनको सुरक्षित रखने मे आन्तरिक लेखा निदेशालय की भी अपनी खास भूमिका रही है वहीं दूसरी ओर शासन स्तर से भी वित्त लेखाधिकारी से लेकर वित्त नियंत्रक स्तर तक के पदों पर की जाने वाली तैनाती में किसी को रोको तो किसी को छोड़ो का खेल धड़ल्ले से जारी है.

आंतरिक लेखा एवं लेखा परीक्षा निदेशालय बना स्थानांतरण का अड्डा

आंतरिक लेखा एवं लेखा परीक्षा निदेशालय बना स्थानांतरण का अड्डा

 

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