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वाह रे सिस्टम, वित्त विभाग की सुस्ती और सूबे में घोटाले का मौसम

#वर्ष 2014 से खाद्य विभाग का और 2016-17 से ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के बजट लैप्स प्रकरण में अभी तक हुई केवल लीपापोती.

अफसरनामा ब्यूरो
लखनऊ : उत्तर प्रदेश में घोटालों के उजागर होने का मौसम जैसे अपने पूरे शबाब पर है, लेकिन राज्य के वित्तीय प्रबंधन तंत्र की खुमारी बरकरार है. ऊर्जा विभाग, नगर निगम, पुलिस विभाग, पंचायतीराज विभाग तक वित्तीय अनियमितता और सरकारी धन के बंदरबाँट की चर्चा जैसे आम जिंदगी का हिस्सा बन गयी है. व्यवस्था की कमियों का आलम यह है कि मलाईदार निगमों में राज्य वित्त सेवा के अधिकारी तैनात नहीं है वहाँ के GPF रखरखाव से AG का कोई संबंध नहीं है, और जिन विभागों में वित्त विभाग के अफसर तैनात भी हैं उनके द्वारा वित्त को त्रैमासिक रिपोर्ट नहीं भेजी जा रही. प्रमोशन और ट्रांसफर में जुगाड़ हावी है. ऐसे में घोटाले या अनियमितताओं की फेहरिस्त लम्बी होना स्वाभाविक है और उन पर नियंत्रण पाना मुश्किल है. खाद्य विभाग में राशन घोटाले का मुद्दा वर्ष 2014 में भी उठ चुका है फिर भी किसी स्थायी समाधान या सतर्कता बरतने के लिये प्रयास नदारद रहे. इसी तरह ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में बजट लैप्स और वित्त नियंत्रक की मनमानी के किस्से सुने जाते रहे लेकिन लगता नहीं कि कार्यवाही के लिए प्रकरण को संज्ञान में लिया गया.

दरअसल वित्तीय वर्ष 2016-17 में शासन के वित्त विभाग द्वारा ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के खर्चे के लिए रूपये 351.23करोड़ की धनराशि का बजट प्राविधान किया गया था लेकिन इसमें से एक अंश की धनराशि न तो स्वीकृत हुई और न ही समर्पित. इसके अलावा इस सम्बन्ध में विभाग के वित्त नियंत्रक ने न तो अपर मुख्य सचिव, ग्रामीण अभियंत्रण और न ही अपर मुख्य सचिव, वित्त को बताना जरूरी समझा. चूंकि इस मामले में RES के ACS स्वयं सम्पूर्ण प्राविधानित बजट अवमुक्त नहीं कर पाये थे इसलिए बात बढ़ाना जरूरी नहीं लगा होगा अन्यथा क्या कारण हो सकता है कि बजट के नियंत्रण के लिए तैनात वित्त नियंत्रक की कोई जिम्मेदारी निर्धारित नहीं हो पायी. यहीं नहीं ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में लैप्स बजट को छिपाने का जिम्मेदार वित्त नियंत्रक ही प्रकरण का जांच अधिकारी भी बन गया और मामले में गोल मोल क्लोजर रिपोर्ट भी लगा दी. खबरों में तमाम तथ्य सामने आने के बाद भी वित्त विभाग क्यों उदासीन बना रहा? वित्तीय सांख्यिकीय विभाग के आँकड़ों और आदर्श कोषागार, जवाहर भवन से कोई रिपोर्ट क्यों नहीं ली गयी? इस पर अभी तक पर्दा पड़ा हुआ है. संवेदनशील मामलों में उदासीन रहने से प्रदेश का वित्तीय अनुशासन कैसे प्रभावी होगा यह भी विचारणीय है.

फिलहाल शासन स्तर पर ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के प्रशासनिक विभाग में तैनात रहे 2 अफसर रामरतन और बाबूराम वित्त विभाग में विशेष सचिव के पद पर तैनात हो चुके हैं और निकट भविष्य में वित्त नियंत्रक धनन्जय सिंह की पदोन्नति की जानी है तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे प्रकरणों को अफसरशाही कितनी गंभीरता से लेगी. लेकिन यह तय है कि छोटे किन्तु संवेदनशील मसलों पर चुप्पी से ही भविष्य में बड़ी घटनाओं की नींव पड़ती है.

गौरतलब है कि वित्तीय अनुशासन का पाठ पढाने और जीरो टोलरेंस की नीति पर काम करने वाली योगी सरकार वित्तीय प्रबंधन और आडिट से जुड़े मामलों की समीक्षा नहीं कर पा रही है. पीडब्ल्यूडी विभाग में भी योजनाओं की बचत धनराशि का सही लेखा जोखा उपलब्ध न करा पाने का मुद्दा गोरखपुर के विधायक राधा मोहन अग्रवाल द्वारा उठाया गया और मामला लोक लेखा समिति में गया जिसमें करीब डेढ़ सौ इंजीनियर दोषी पाए जाने की खबरें सुर्खियां बनी. व्यवस्था की कमियों को दूर करने और व्यक्ति अनुशासन का पाठ पढ़ाने तथा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की कवायद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा लगातार जारी है फिर भी आडिट व ग्रामीण अभियंत्रण जैसे विभाग अभी तक इनकी पहुँच से दूर हैं. दागियों और लापरवाह अफसरों पर सियासी वरदहस्त भी कहीं न कहीं इसके सुधार में बाधा के प्रमुख कारणों में से एक है. योगी सरकार के अब तक के कार्यकाल में सबसे ज्यादा किरकिरी जिस ऊर्जा विभाग के पीएफ फंड घोटाले को लेकर हो रही है उसमें भी कहीं न कहीं वित्तीय प्रबंधन और आडिट की कमी रही है. इसके बावजूद भी अभी तक इन सब प्रकरणों में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जा सका है. लेकिन हद तो तब होती है जब वित्तीय प्रबंधन देखने वाला वित्त विभाग और आडिट महकमे के संज्ञान में तमाम प्रकरण होने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाये जाते. जिसका अंदाजा ग्रामीण अभियंत्रण विभाग जैसे महकमे के अफसरों की कारगुजारीयों से लगाया जा सकता है. ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में बजट लैप्स और वित्त नियंत्रक की मनमानी की खबरें सुर्ख़ियों में रहीं लेकिन प्रकरण को संज्ञान में नहीं लिया जा सका है. विगत दिनों ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में बचत धनराशि के सरेंडर का एक मुद्दा उठाया गया था लेकिन प्रमाणिकता होने के बावजूद आज तक इस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई और मामले को पूरा दबाने का प्रयास किया गया.

वित्त विभाग के दो अनमोल रतन, एक धनन्जय तो एक रामरतन

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ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में की जा रही लैप्स बजट को छिपाने की कोशिश

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