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ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में की जा रही लैप्स बजट को छिपाने की कोशिश

 #शासन की नोटिस पर अब कार्यवाही के बजाय मामले को फाईलों में उलझाने में लगे दोषी 

#विभाग के वित्त नियंत्रक और डीडीओ के स्तर से वास्तविक व्यय के आंकड़ों में की गयी हेराफेरी

अफसरनामा ब्यूरो 

लखनऊ : सूबे की अफसरशाही के अजब गजब कारनामे, पहले तो बजट को लैप्स होने दिया और बाद में उसको शासन के संज्ञान में लाना भी उचित नहीं समझा. विधान मंडल की स्वीकृति के बाद जब शासन के वित्त विभाग से सूबे के हर विभागों को बजट रिलीज किया जाता है तो यह अपेक्षा रहती

है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे अफसर पूरी तन्मयता से वित्तीय अनुशासन को मानते हुए बजट का सदुपयोग करेंगे और अवशेष बजट को वित्त वर्ष की समाप्ति के पहले ही शासन को वापस समर्पित कर देंगे. लेकिन सूबे के बिना बजट वाले ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के वित्त नियंत्रक द्वारा इसके इतर एक अलग ही कारनामें को अंजाम दिया गया है और मामला जब शासन स्तर पर पहुंचा तो मामले को फाईलों में उलझाने का प्रयास जारी है.

मामला वित्त वर्ष 2016-17 के लिए अधिकारी,कर्मचारी के वेतन और भत्ते तथा गाडी आदि के लिए  शासन से स्वीकृत किये गए रूपये 350.32 करोड़ रूपये के बजट से है. जिसमें से 275.45 करोड़ रूपये का आवंटन विभाग के जिलास्तरीय कार्यालयों तथा मुख्यालय पर तैनात डीडीओ को किया गया था. शेष बचे 74.87 करोड़ का समर्पण शासन के वित्त विभाग को कर दिया गया.  यहाँ तक तो ठीक था लेकिन इसके बाद मुख्यालय पर तैनात डीडीओ अशोक कुमार, अधिशाषी अभियंता के निवर्तन पर  जो बजट रिलीज  किया गया था उसमें से लगभग 34.96 लाख रूपये को न तो खर्च किया गया और न ही वापस सरेंडर ही किया गया. सरेंडर किये गए 74.87 करोड़ में गाडी आदि की खरीद के लिए रिलीज किये गए उक्त 34.96 लाख रूपये की रकम शामिल नहीं थी.

 

निदेशालय स्तर पर फिर लैप्स बजट को दूसरे विभाग के पीएलए खाते में ट्रांसफर करने का प्रयास शुरू हुआ, जोकि किसी भी तरह से नियमानुकूल नहीं था. क्यूंकि ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में कोई पीएलए (Personal Ledger Account) एकाउंट की व्यवस्था लागू नहीं है, इसके अलावा जिस विभाग में पीएलए व्यवस्था है भी वहां                        पर भी एक वर्ष के लैप्स बजट को उसके अगले वर्ष में पीएलए में ट्रांसफर की अनुमति नहीं है.

वित्तीय वर्ष की शुरुआत में ही कुछ इसी तरह के प्रकरण में नेडा के तत्कालीन वित्त नियंत्रक को सस्पेंड कर दिया गया था. जब दूसरे विभाग द्वारा इस तरह के कृत्य को नियम विरुद्ध माना जाता है तो ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के वित्त नियंत्रक और डीडीओ के स्तर से वास्तविक व्यय के आंकड़ों में हेराफेरी कर अवशेष धनराशी के बारे में  शासन के वित्त विभाग को गुमराह किया गया, और इस बची रकम को वित्त विभाग के संज्ञान में नहीं लाने दिया गया. इस पूरे कृत्य को वित्त नियंत्रक और डीडीओ द्वारा पत्राचार में उलझाते हुए मामले की लीपापोती करने की कोशिश अभी तक जारी है. जानकारी के अनुसार वित्त नियंत्रक अपने विभाग के मंत्री से अपनी अच्छी सांठ-गाँठ का हवाला देते सुने जाते हैं, और विभाग के जिले के अधिकारियों पर मंत्री जी का नाम लेकर अपनी धौंस जमाने का काम भी करते हैं. इस तरह से उक्त प्रकरण में खुद वित्त नियंत्रक बचे और डीडीओ को भी बचाने में कामयाब हुए हैं. फिलहाल डीडीओ पर कार्यवाही की फाईल शासन और विभागीय मंत्री के बीच धक्के खा रही है. सूत्रों की मानें तो ऐसा मंत्री जी से वित्त नियंत्रक की नजदीकियों के चलते हो रहा है.

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