
#अयोध्या के राजर्षि दशरथ मेडिकल कालेज से संबद्ध अस्पताल में लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े मरीजों को संक्रमण से बचाने के लिए होने वाले अधूरे शोध के लिए खरीदा गया लाखों रुपये के गोदाम में पड़े शैंपू और बॉडीवॉश का लाभ मरीजों तक पहुंचाने के बजाय खेल में जुटे जिम्मेदार.
#बिना बिल, बाउचर और परचेज आर्डर के दवा खरीदने का मामला पहले ही हो चुका है उजागर, शासन स्तर से भी गठित की जा चुकी है जांच टीम. मेरठ के लाला लाजपतराय मेडिकल कालेज के प्राचार्य आरसी गुप्ता के नेतृत्व में कानपुर मेडिकल कालेज के एफसी भी शामिल रहे. दरअसल मामले में प्रमुख सचिव स्वास्थ्य ने 15 दिनों के अन्दर रिपोर्ट को सौंपने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाई के दे चुके हैं निर्देश.
#नियमविरुद्ध व मनमाने तरीके से प्रतिनियुक्ति पर तैनात किये गए कर्मियों की वापसी का मुद्दा भी रहा सुर्ख़ियों में, मेडिकल कालेज के प्रधानाचार्य की हुई थी किरकिरी, फ़िलहाल शासन ने पत्र भेजकर लगायी रोक.
अफसरनामा ब्यूरो
अयोध्या : अयोध्या मेडिकल कालेज मरीज हित को दरकिनार कर स्वहित के खेल का अड्डा बन गया है. मरीजों के नाम पर बिना बिल की दवाओं के खेल के बाद अब एक दूसरा खेल सामने आया है. दरअसल अयोध्या के राजर्षि दशरथ मेडिकल कालेज से संबद्ध अस्पताल में लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े मरीजों को संक्रमण से बचाने के लिए होने वाला शोध अधूरा है. इसके लिए खरीदा गया लाखों रुपये का शैंपू और बॉडीवॉश गोदाम में पड़ा है. मौजूदा अधिकारी अब मरीजों को इसका लाभ पहुंचाने के बजाय इसकी खरीद पर ही सवाल उठा रहे हैं. सूत्रों की मानें तो जिन चीजों को एक्सपायर बताया जा रहा है, दरअसल वह एक्सपायर नहीं हैं. उनकी वैधता मैन्युफैक्चरिंग तिथि जून 2025 से 36 माह की है जोकि उनके रैपर पर स्पष्ट लिखा है.

दरअसल अस्पताल के ऑर्थो, न्यूरो सर्जरी व आईसीयू में भर्ती मरीज लंबे समय तक बेड पर पड़े रहते हैं. नहाने धोने में अक्षम होने से उन्हें कई तरह का संक्रमण हो जाता है. खतरों से बचाने के लिए उनके लिए मेडिकल कॉलेज दर्शन नगर में एक शोध की कार्ययोजना तैयार की गई. इसके लिए 19.76 लाख रुपये से 2000 पीस जलरहित बॉडीवाश व 2200 पीस शैंपू खरीदा गया. 09 सितंबर, 2025 को आपूर्ति होने के बाद बाल रोग, न्यूरो सर्जरी, स्त्री एवं प्रसूति रोग विभागों में इसका उपयोग भी हुआ. नवंबर से शोध की प्रक्रिया शुरू हुई तो 16 जनवरी, 2026 को तत्कालीन प्राचार्य को हटा दिया गया, तब से शोध कार्य अधूरा है.
जानकारों के मुताबिक़ विगत कुछ माह से अपने कर्म नहीं कारनामों से सुर्खियाँ बटोर रहे राजर्षि दशरथ मेडिकल कालेज प्रशासन की यह अक्षमता दर्शाता है. जहाँ मौजूदा अधिकारी प्रशासनिक कमजोरियों को दूर कर मरीजों को लाभ पहुंचाने के बजाय केवल टांग खिंचाई में लगे हैं. इसके पहले भी रामनगरी के इसी मेडिकल कालेज में दवाओं के खेल और दवा सप्लायरों से सांठगाँठ की खुली पोल से खलबली मची थी. जिसमें बिना परचेज आर्डर और बिना बिल बाउचर के अपनी चहेते सप्लायरों से दवाओं का स्टाक मंगा लिया गया था.
इसी राजर्षि दशरथ मेडिकल कालेज के प्रधानाचार्य ने पहले बिना शासन की पूर्व अनुमति के प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारियों/कर्मचारियों का तबादला आदेश जारी कर दिया था. लेकिन मामला प्रकाश में आने के बाद 12 दिन बाद ही उसी अपने आदेश को “काम की अधिकता बता” निरस्त कर दिया. निरस्तीकरण आदेश की जड़ में अनिधिकृत रूप से हुई दवा सप्लाई प्रकरण के खुलासे की दिख हड़बड़ी रही थी. फिलहाल प्रमुख सचिव स्वास्थ्य द्वारा पत्र जारी कर प्रतिनियुक्ति पर तैनात कर्मियों की वापसी सम्बन्धी दिशा निर्देश जारी करते हुए शासन से अनुमति को अनिवार्य कर दिया है.

इसी बिना बिल बाउचर और परचेज आर्डर के मामले के प्रकाश में आने के बाद शासन स्तर से जांच गठित की गयी और जांच कमेटी ने अभी चंद दिन पहले कालेज पहुँच कर पूछताछ भी कर चुकी है. इस प्रकरण की जांच मेरठ के लाला लाजपतराय मेडिकल कालेज के प्राचार्य आरसी गुप्ता के नेतृत्व में कानपुर मेडिकल कालेज के एफसी भी शामिल रहे. दरअसल मामले में प्रमुख सचिव स्वास्थ्य ने 15 दिनों के अन्दर रिपोर्ट को सौंपने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाई के निर्देश दिए हैं.


