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क्या ऊर्जा विभाग में खत्म है सीएम योगी का इकबाल, क्यों संजय तिवारी बच रहे अंशुल हुए हलाल

राजेश तिवारी

लखनऊ : ऊर्जा विभाग के उत्पादन निगम में उड़ रही मुख्यमंत्री योगी के बयानों व मंशा की खिल्ली, शासन जिम्मेदार या प्रबंधन. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सूबे की सत्ता संभालने के साथ ही भ्रष्टाचारियों और पदों पर बैठे गैर जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मचारियों को लेकर सख्ती बनाये हुए हैं. लेकिन ऊर्जा विभाग के उत्पादन निगम में उनके इस मिशन को ठेंगा दिखाने का काम किया जा रहा है. जबकि दूसरी तरफ ऊर्जा विभाग का ही विद्युत् वितरण निगम चंद महीनों में ही अपने दोषी निदेशक तकनीकी अंशुल अग्रवाल को उनकी गैर जिम्मेदाराना हरकत के लिए जांच कर दोषी ठहराया और चार्जशीट दे निदेशक के पद से हटा दिया.

ऐसे में सवाल यह है कि योगी राज में संजय तिवारी जैसा दोष सिद्ध आरोपी कैसे कुर्सी पर बैठा रह सकता है. संजय तिवारी को उसके इंजीनियरिंग सेवा से रिटायरमेंट के दिन ही चार्जशीट क्यों दी गयी ? जांच और सजा के नाम पर देरी कर मामले को लटकाने का काम किसने किया शासन या प्रबंधन ने ? जवाब क्या सरकार के पास है. और आज जब उसको पुनः चार्जशीट दी जा चुकी है तो पद से हटाने में देरी की क्या वजह है ? जबकि एक समान पद पर तैनात संजय तिवारी भी दोष सिद्ध आरोपी हैं और अंशुल अग्रवाल भी दोष सिद्ध आरोपी रहे तो एक को सजा देने में हीलाहवाली क्यों ?

अंशुल अग्रवाल के मामले में प्रबंधन ने कुछ ही महीनों में जांच कर चार्जशीट दे सजा दिलवाने का काम किया. लेकिन संजय तिवारी के मामलों में जांच व सजा दें की प्रक्रिया के नाम पर उलझाया गया. वित्तीय अनियमितता के मामले में थर्ड आडिट की जांच में दोषी पाए जाने के बाद उसको विभागीय जांच के नाम पर लटकाया गया ताकि उसका निदेशक पद बचा रहे. ओबरा अग्निकांड में भी कुछ इसी तरह का खेल किया गया, ओबरा अग्निकांड में चार्जशीट देने का समय भी संजय तिवारी के रिटायरमेंट के दिन चुना गया ताकि वह उसको अपने हथकंडों से उलझा सके और वही हो रहा है.

जबकि दूसरी तरफ उत्पादन निगम में निदेशक कार्मिक जैसे महत्वपूर्ण पद पर तैनात निदेशक कार्मिक संजय तिवारी पर कार्यवाही करने में सालों बीतने के बाद भी मामले को उलझाकर केवल उसके बचे 10 महीने के कार्यकाल को बिताने का काम किया जा रहा है . अब संजय तिवारी को सजा देने के बजाय, वित्तीय अनियमितता और दोष सिद्ध आरोपी होने के बाद भी उसको निदेशक कार्मिक जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठाये रखने व मुख्यमंत्री के निर्देशों और सरकार की मंशा को ठेंगा दिखाने का काम अभी तक कौन करता चला आ रहा है शासन या फिर प्रबंधन, यह देखना सरकार का काम है.

उत्पादन निगम के निदेशक कार्मिक संजय तिवारी के मामले में फिलहाल चार्जशीट दे पल्ला झाड़ने वाला प्रबंधन और आँख बंद कर मामले से अनजान बनता शासन केवल और केवल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीरो टोलरेंस के उन आदेशों तथा मंसूबों को धता बता रहा है जिसका जिक्र वो अक्सर अपने भाषण में गर्व से करते हैं. आखिर जिस अफसर की नियुक्ति ही गलत हुई हो, वह वित्तीय अनियमितता जैसे मामले की थर्ड पार्टी आडिट में दोषी साबित हुआ हो और उत्पादन निगम की ओबरा जैसी महत्वपूर्ण यूनिट के जलने का जिम्मेदार एक उच्च जांच कमेटी ने ठहराया हो, उसको केवल चार्जशीट देकर कार्मिक के मुखिया जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठाये रहें से यह सवाल उठना लाजमी है.

फिलहाल जांच और चार्जशीट के नाम पर अधिकारियों को बचाने और उनके कार्यकाल को निर्बाध रूप से बिताने का वर्षों से चला आ रहा यह खेल योगिराज में भी कायम है और सरकार को या तो गुमराह किया जा रहा है या फिर इस मामले में वह भी अपनी आँखें मूँद बैठी है. इससे सवाल उठता है कि क्या ऊर्जा विभाग में मुख्यमंत्री की कोई हनक नहीं है और यदि ऐसा नहीं है तो इस पर नजर क्यों नहीं है. क्या प्रबंधन शासन को गुमराह कर रहा है या फिर शासन सरकार को.

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हर जांच में दोषी, आरोपपत्र पा चुका संजय तिवारी बाज नही आ रहा, चेयरमैन को गुमराह करने में जुटा ओबरा अग्निकांड का गुनाहगार

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