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“अफसरनामा” की खबर पर लगी मुहर, कोरोना किट की खरीद में हुए घोटाले की जांच करेगी एसआईटी

#टीम-11 के प्रमुख सदस्य की चूक सवालों के घेरे में, हमलावर विपक्ष को एसआईटी नहीं मंजूर, की सीबीआई की मांग.

अफसरनाम ब्यूरो
लखनऊ : “अफसरनामा” की खबर पर लगी मुहर, कोविड-19 सर्वेक्षण किट घोटाले को भले ही सुल्तानपुर और गाजीपुर तक सीमित करने की कोशिश जिम्मेदारों द्वारा की गयी हो, परन्तु जीरो टोलरेंस के प्रति सजग सीएम योगी ने मामले की व्यापकता को देखते हुए एक विशेष जांच टीम गठित करने की घोषणा कर दिया. “अफसरनामा” ने अपनी रिपोर्ट में उन बिन्दुओं को उठाया था जिसकी अनदेखी शासन में बैठे जिम्मेदारों द्वारा की गयी. रिपोर्ट में लिखा गया कि किस तरह से इस घोटाले की जमीन तैयार की गयी और इसमें अन्य को भी मौका मिला. इस बीच सरकार केवल व्हाट्सअप पर ही चलती रही और घोटाले की पृष्ठभूमि मानिटरिंग के लिए गाईडलाइन और खरीद के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित नहीं होने से बनी.

फिलहाल सरकार ने एसआईटी तो गठित कर दी है लेकिन तमाम सवालों को भी जन्म दे दिया है. सवाल यह कि गठित SIT टीम की अध्यक्ष रेणुका कुमार अपने समकक्ष शासन में बैठे आला अफसरों से हुई चूक की जांच कैसे कर सकेंगी जोकि मुख्यमंत्री के टीम 11 के एक अहम सदस्य भी हैं. इस विशेष जांच टीम में क्यों किसी आईपीएस अफसर को नहीं रखा गया. चूंकि मामला पैसे से जुड़ा है तो इसमें किसी आडिट विभाग के अफसर को क्यों सम्मिलित नहीं किया गया. कोरोना किट घोटाले के इस मामले में एक अहम और चौंकाने वाली बात यह है कि गुरूवार को जारी सरकारी प्रेसनोट में 23 जून के जिस शासनादेश संख्या 1596/33-3-2020-114-2012 का जिक्र किया गया है वह SHASNADESH.UP.GOV.IN वेबसाईट पर उपलब्ध नहीं हैं और इसमें भी कोरोना किट की खरीद प्रक्रिया और मूल्य का कोई स्पष्ट जिक्र नहीं किया गया है. 23 जून को जारी इस प्रेस नोट में भी एक शासनादेश संख्या 844/33-3-2020-114/2012 दिनांक 10.03.2020 का हवाला दिया गया है और वह भी शासनादेश की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है जोकि शीर्ष स्तर पर किसी गड़बड़ी की तरफ इशारा करता है.

इस प्रकरण में एक अहम पहलू यह भी है कि शासन द्वारा जारी गए फंड का 50% शहरी नगर निकाय और 50% ग्रामीण निकाय को दिया गया था. अपर मुख्य सचिव पंचायती राज मनोज कुमार सिंह के पास ग्रामीण निकायों की जिम्मेदारी थी और उन्होंने 24 जुलाई को शहरी निकायों के लिए नगर विकास के प्रमुख सचिव को पत्र लिखा कोरोना किट के रेट के संदर्भ में जबकि उसी पत्र को खुद अपने जिला पंचायत राज अधिकारी को भेज अवगत नहीं करा सके. इस तरह दिनांक 24 जुलाई 2020 को पत्रांक संख्या 80/ए.सी.एस.आर.डी./पी.आर./2020 का यह पत्र अपर मुख्य सचिव पंचायतीराज मनोज कुमार सिंह और प्रमुख सचिव नगर विकास दीपक कुमार के बीच केवल पत्राचार मात्र  रह गया.

बिहार के पशुपालन, मध्य प्रदेश के व्यापम और यूपी के एनआरएचएम घोटाले की श्रृंखला में एक नया नाम अब सूबे में कोरोना किट खरीद में हो रहे घोटाले के जुड़ने की आशंका से सूबे की नौकरशाही हलकान है. ग्राम पंचायतों और नगर पंचायतों में महामारी को काबू में करने के लिए खरीदे गए पल्स ऑक्सीमीटर, इंफ्राट्रेड थर्मामीटर, हेमेटोलोजी एनलाईजर,थर्मल स्कैनर, सेनीटाइजर आदि की खरीद में हुए अनाप-शनाप भुगतान और मात्रा की जांच की जोर पकड़ती मांग के बीच प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री संजय प्रसाद के द्वारा दिनांक 27.08.2020 के अपने पत्र के माध्यम से अपर मुख्य सचिव पंचायती राज को प्रकरण की जांच कराने का आदेश दिया गया है. लेकिन संजय प्रसाद के हवाले से जारी किए गए इस पत्र के बाद जांच के इस आदेश पर भी सवाल उठे क्योंकि जानकार इस पूरे प्रकरण में अपर मुख्य सचिव पंचायती राज द्वारा मामले को स्पष्ट और पारदर्शी गाइडलाइन जारी न करने की घोटाले की एक प्रमुख वजह मान रहे हैं. और संभव है कि सरकार इसी वजह से गुरूवार को अपर मुख्य सचिव राजस्व रेणुका कुमार की अध्यक्षता में SIT गठित कर दिया है.

सुल्तानपुर से बीजेपी विधायक देवमणि द्विवेदी द्वारा प्रकरण को लिखित रूप से गरमाया गया इसलिए सरकार पूरी जांच को सुल्तानपुर तक ही सीमित कर रही है. आप के सांसद संजय सिंह ने 65 जिलों में भ्रष्टाचार किए जाने का दावा करते हुए 20 जिले की कारगुजारी ओं के सबूत होने का दावा किया है. लेकिन अफसरशाही रक्षात्मक बनी हुई है और जांच का आदेश देकर मामले को लंबा खींच और ठंडा करने के प्रयास में लगी हुई है. जबकि सुल्तानपुर के अलावा शामली में कंस्ट्रक्सन कंपनी को काम दे दिया गया. पीलीभीत, झांसी, प्रतापगढ़, अंबेडकरनगर आदि जिले भी इस प्रकरण से अछूते नहीं रहे. सवाल यह है कि क्या शासनादेशों की मनमानी कर अनदेखी कर जिला स्तर पर जिला अधिकारी मनमानी करते रहे या शासनादेश ही स्पष्ट नहीं था और जिसके चलते जिले के जिलाधिकारी द्वारा खेल करने का मौका मिल गया.

कोरोना किट की खरीद के लिए कोई स्पष्ट गाइडलाइन व दिशा निर्देश मूल्य व खरीद की प्रक्रिया के संदर्भ में शासन द्वारा न जारी किया जाना ही इस प्रकरण को घोटाले का रूप दिए जाने का कारण बना और सरकार के लिए किरकिरी का सबब. कोरोना महामारी के चलते आर्थिक व बीमारी जैसे अन्य परेशानियों से जूझ रही आम जनता भी इस घोटाले से आहत है. लोगों का कहना है यहां इंसान अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है और नीति नियंता इस पूरे मामले को गोलमोल कर घोटाले की जमीन तैयार करने में लगे रहे. लोगों तक पहुंच चुके कोरोना किट घोटाला कांड की आंच आने वाले समय में सत्ताधारी दल भाजपा और मुख्यमंत्री योगी के लिए गहरी चोट ना साबित हो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता.

 

कोरोना महामारी के बीच भ्रष्टाचार की जीरो टोलरेंस की नीति आयी सवालों के घेरे में

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