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जल संरक्षण के उपायों पर विभाग नहीं हैं गंभीर, जिलों के अफसरों से भी नहीं ले सके सबक

#अयोध्या व शाहजहांपुर के अफसर तमसा व गोमती में मनरेगा जैसी योजना का सदुपयोग कर पेश कर चुके हैं मिशाल.

#मेघालय जलनीति बनाने वाला बना देश का पहला राज्य, यूपी में जलशक्ति अभियान में संबंधित विभागों की भूमिका तक नहीं हो सकी तय.

#योगी का नगर विकास और जलनिगम ठोस नीति बनाने में हुआ फेल, गोमती को लेकर जिम्मेदार अभी तक रंगरोगन के सहारे हुक्मरानों को कर रहे खुश.

#सर्व शिक्षा अभियान व कृषि विभाग के यूपी-डास्प की तरह जलशक्ति अभियान के तहत इकाईयों का गठन क्यूँ नहीं.

विजय कुमार  

लखनऊ : जल संरक्षण के उपायों को लेकर जलनीति बनाकर मेघालय जहां देश में सबसे आगे है वहीँ उत्तर प्रदेश की अफसरशाही खुद अपने ही जिले के अफसरों की कार्यप्रणाली का अनुसरण नहीं कर पायी है. सूबे में गंगा की सहायक नदियों में तमसा नदी में मनरेगा जैसी योजना का सदुपयोग करते हुए जनवरी 2019 में तत्कालीन डीएम डॉ. अनिल पाठक, डीसी मनरेगा नागेंद्र मोहन राम त्रिपाठी ने मिशाल पेश किया. इसके अलाव कुछ इसी तरह शाहजहांपुर के डीएम रहे अमृत त्रिपाठी जैसे उत्साही अफसर द्वारा स्वप्रेरणा से गोमती के उद्धार हेतु शुरुआत किया जाना एक नजीर है. ऐसे कदमों से नदियों के जल संचयन, भू-गर्भ जल रिचार्ज का बड़ा श्रोत नदी का जल प्रवाह अविरल बनेगा. जानकारों का मानना है कि गोमती जैसी नदियों के पुनुरुद्धार करने का लाभ हजारों तालाबो के पुनुरोद्धार से मिलने वाले लाभ से ज्यादा है, लेकिन इस पर जिम्मेदारों की उदासीनता कई प्रश्न खड़े करती है.

बीजेपी के सहयोग से बनी मेघालय सरकार जहां जल नीति बनाकर जहां देश में पहला स्थान हासिल किया है, वहीँ उत्तर प्रदेश की पूर्ण बहुमत की योगी सरकार के नीति-नियामक जलशक्ति अभियान में सभी संबंधित विभागो की भूमिका तक नहीं तय कर पाये हैं. देश के उत्तर-पूर्व का राज्य मेघालय ने शुक्रवार को जल के उपयोग से लेकर उसके संचयन तक एक गंभीर चर्चा के बाद अपनी जलनीति को अंतिम रूप दे दिया. लेकिन योगी के नेतृत्व वाली पूर्ण बहुमत की सरकार में अभी भी उन्हीं कार्यशैली को अपनाया जा रहा है जोकि पिछली सरकारों से चला आ रहा है. अफसरों के निर्णय लेने की धीमी गति और क्षेत्रीय स्तर पर आधारभूत सांगठनिक ढांचे का अभाव इस महत्वाकांक्षी अभियान की सफलता में बाधक ही बनेगा और पैसों का समुचित उपयोग नहीं किया जा सकेगा. गांवों -कस्बों में लेखपाल या उस स्तर के अन्य कर्मचारी को अंतिम दायित्व सौंपकर निश्चिंत हो जाने की प्रवृति से किसी भी अभियान या परियोजना को मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता.

सूबे में नमामि गंगे परियोजना और उसकी सहायक गोमती जैसी नदियों की साफ़ सफाई व संरक्षण को लेकर अभी तक पूर्व की सरकारों से चली आ रही नीतियाँ आज भी योगी सरकार में अनवरत जारी हैं. जहां इसके लिए सम्बंधित विभागों को जिम्मेदारी के साथ शामिल न करके दूसरे विभागों से काम कराने की प्रथा चली आ रही है. जल वितरण का काम देखने वाला जलनिगम जल संरक्षण और संचयन का काम देख रहा है तो पौधारोपण का काम नगर निगमों और लेखपाल जैसे पंचायती विभाग के कर्मचारी कर रहे हैं. इसके विपरीत यदि अफसरशाही में काम करने की इच्छा शक्ति हो तो रामायणकालीन तमसा नदी की तर्ज पर गोमती का भी कल्याण हो सकता था जोकि गंगा की प्रमुख सहायक नदी है. लेकिन ठोस उपाय के बजाय रंगरोगन के सहारे केवल कागजों में हो रहे काम से गोमती जैसी सहायक नदियों का उद्धार नहीं संभव है और नमामि गंगे परियोजना भी उत्तर प्रदेश में कागजी ही रह जायेगी.

“अफसरनामा” द्वारा गोमती के संरक्षण और उसके जल संचयन को लेकर अभी तक प्रदेश के नगर विकास विभाग और जलनिगम द्वारा उठाये गये कदमों को केवल रंगरोगन वाला बताये जाने के बाद हरकत में आई सरकार ने जलनिगम के प्रबंध निदेशक के पद पर अनिल गोठलवाल को नगर विकास विभग का सचिव नियुक्त करते हुए जलनिगम के प्रबंध निदेशक का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया. इसके अलावा एक अहम फैसले में गंगा की सहायक नदियों के पुनुरुद्धार के लिए ग्राम्य विकास विभाग को नोडल एजेंसी के तौर पर काम करनी की जिम्मेदारी दे दी जबकि केंद्र की नमामि गंगें परियोजना की नोडल एजेंसी नगर विकास विभाग भी कुछ लीपापोती जैसे फैसले इस बीच लिए वहीँ वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा भी इस सम्बन्ध में जागरूक होते हुए कई कमेटियों का गठन किया. जबकि जिले स्तर पर जल संरक्षण और संचयन हेतु जरूरी विभागों की सहभागिता पर कोई ठोस कार्य होता नहीं दिख रहा है. अभी तक इस तरह के हर काम जिले स्तर पर केवल निचले स्तर के एक दो कर्मचारियों जैसे कि लेखपाल आदि के हवाले होता रहा है. बड़ा सवाल यह है कि वृक्षा रोपड़, जलसंरक्षण, नदियों के पुनुरोद्धर जैसे आवश्यक महत्वपूर्ण काम भी यही करते रहे हैं जबकि इनकी इस काम में कोइ विशेषज्ञता न होने और क्षमताएं सीमित होने से जमीनी स्तर पर योजना दम तोड़ देती है.

इसके अलावा एक तरफ प्रधानमन्त्री इसको एक जनआन्दोलन का रूप देने की बात करते हैं जबकि शिक्षा विभाग में सर्व शिक्षा अभियान और कृषि  विभाग ने यूपी-डास्प की सफलता हेतु जिला स्तर पर आधारभूत संरचना के रूप में इकाईयां गठित की हैं, इस तरह यदि जलशक्ति अभियान के तहत भूजल स्तर को सुधारने के लिए भूजल की गुणवता बढाने और नदियों के पुनरोद्धार हेतु प्रत्येक जिले में आधारभूत संरचना के रूप में इकाईयों का गठन कर शीर्ष स्तर द्वारा इसकी मानीटरिंग की जाती तो इसके उत्साही परिणाम सामने आते और इस काम में जन सहभागिता भी दिखती.

सूबे में गंगा की प्रमुख सहायक गोमती जैसी नदियों की अनदेखी करके नमामि गंगे को सफल बनाने की कल्पना भी बेकार है. जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों से निपटने के लिये आवश्यक है कि गोमती सहित अन्य नदियों की दशा में मौलिक परिवर्तन के मौलिक उपायों को अमलीजामा दिया जाये न कि कामचलाऊ व्यवस्था के तहत रस्म अदायगी करके हुक्मरानों को खुश करने का काम किया जाये. गोमती के उद्गम स्थल से कुछ ही दूरी पर चिरकाल से प्रवाहित रहने वाली कई पतली धाराएं विलुप्त हो चुकी हैं. सरकार को इसके कारणों की पड़ताल कराके उन जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के उपाय करने चाहिये. भू-जल स्रोतों को शक्ति प्रदान करना और गिरते जलस्तर को बचाना ही जलशक्ति अभियान का सार है.

केंद्र सरकार द्वारा देश भर में जल शक्ति अभियान को लागू करने के लिए उत्तर प्रदेश के जिन 36 जिलों का चयन किया गया है उनमें एटा, जौनपुर, बिजनौर, सहारनपुर, रामपुर, रायबरेली, फतेहपुर, बदायूं, अलीगढ, प्रतापगढ़, संभल, अमरोहा, मेरठ, वाराणसी, मैनपुरी, संत रविदास नगर, शामली, कानपुर नगर, हापुड़, आगरा, फिरोजाबाद, कन्नौज, महोबा, गौतमबुद्धनगर, चित्रकूट, गाजियाबाद, हाथरस, बागपत, प्रयागराज, मथुरा, कासगंज, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, मिर्जापुर, बुलंदशहर और कौशाम्बी का नाम शामिल है. लेकिन जलशक्ति अभियान के लिए चयनित जिलों में गोमती के प्रभाव वाले 11 जिलों में से प्रतापगढ़ और जौनपुर को छोड़कर कोई जिला शामिल नहीं किया गया है. जबकि पिछले दिनों केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री और मुख्यमंत्री के बीच बैठक में गंगा की सहायक नदियों के संरक्षण का मुद्दा उठा था और नमामि गंगे परियोजना की धीमी प्रगति के लिए नोडल एजेंसी जलनिगम के अफसरों को योगी ने खूब लताड़ा था. जल शक्ति अभियान के तहत तालाबों की खुदाई के अलावा नहरों व् नालों की सिल्ट साफ़ कराया जाना है. जिससे बरसात का पानी बर्बाद न हो और जमीन के अंदर पानी की रिचार्जिंग होती रहे ताकि जल स्रोत सूखे नहीं. ऐसे में यदि बरसात से पूर्व गोमती के सिल्ट की सफाई हो जाती तो भूमिगत जल के रिचार्जिंग का सबसे बड़ा स्रोत माने जाने वाली इस नदी से जलशक्ति अभियान को भी शक्ति मिलती.

फिलहाल प्रदेश सरकार ने ग्राम्य विकास विभाग को मनरेगा के तहत जल संरक्षण के लिए वर्ष 2019-20 में 87477 परियोजनाएं तय की हैं. जिनके तहत प्रदेश में जल संरक्षण एवं जल संचयन का कार्यक्रम शुरू किया जाएगा. साथ ही टेढ़ी, मनोरमा, पांडू, वरुणा, ससुर खादेडी,सई, गोमती, अरिल, मोरवा, मंदाकिनी,तमसा, नाद, कर्णावती, बान व् काली नदी के पुनरोद्धार की कार्य योजना भी बन रही है और इन नदियों के किनारे के गाँवों में 25.58 लाख पौधे लगाये जाने का लक्ष निर्धारित किया गया है. जिसके लिए जन सहभागिता की अपेक्षा की जा रही है लेकिन सवाल यह है कि जब आजतक सरकार इस मुद्दे पर अन्तर्विभागीय मीटिंग तक नहीं कर पायी तो नगर विकास विभाग के सहारे ग्रामीण क्षेत्रों में अलग से कार्य योजना लागू किया जाना कितना आसान होगा. गौरतलब है कि इन नदियों में कई नदियाँ गोमती की सहायक नदी है जबकि गोमती गंगा की मुख्य सहायक नदियों में एक है.

सरकार द्वारा नदियों के पुनरोद्धार के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की निगरानी हेतु जिलास्तर पर निगरानी समितियों के गठन की घोषणा कर दी गयी है, लेकिन अच्छा होता यदि प्रत्येक जिले में लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हुए उन लक्ष्यों को पूरा करने हेतु संशाधन आवंटित कर व्यवस्था को विकेंद्रीकृत कर दिया जाता और लक्ष्यपूर्ण करने हेतु समय सीमा निर्धारित की जाती. लेकिन प्रदेश में गोमती संरक्षण का काम शुरू से लेकर अब तक सरकार चाहे किसी की भी रही हो जलनिगम के पास ही रहा. गोमती के सिल्ट की सफाई के लिए अभी तक कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया जबकि जलशक्ति मंत्रालय द्वारा परम्परागत जल स्रोतों के रखरखाव और पुनुरोद्धार पर जोर दिया है.

तो क्या अब गोमती संरक्षण के लिए होगा ठोस उपाय या फिर पहले की ही तरह रंग-रोगन !

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दस्तक-2 यानी संचारी रोग की रोकथाम की तर्ज पर गोमती संरक्षण का कार्य क्यूँ नहीं?

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भूगर्भ जल से जलमग्न रहने वाली गोमती पर अस्तित्व का संकट, कहीं सरस्वती नदी न बन जाय गोमती 

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